मेहनत से ट्रेडिंग सिस्टम बनाया। महीनों तक बगैर धन लगाए उसको टेस्ट भी कर डाला। पर वास्तविक ट्रेडिंग शुरू की तो लगा घाटे पर घाटा। आखिर कोई कितना सहे। भावना में बहकर तय किया कि इस ट्रेडिंग सिस्टम का बेड़ा गरक हो। भटकने लगे मृग मरीचिका में, पर प्यास न बुझी। जानकार कहते हैं कि हमें मशीन बनना पड़ता है क्योंकि ट्रेडिंग सिस्टम दो-दो महीने घाटा देने के बाद असली रंग दिखाते हैं। अब सुध बुधवार की…औरऔर भी

ट्रेडिंग सॉफ्टवेयर वही, चार्ट वही, वही सारे इंडीकेडर। पर कामयाब ट्रेडरों के तरीके भिन्न होते हैं। उसी तरह जैसे एक ही परिवार के चार भाई एक-सा भोजन करने के बावजूद अलग अंदाज़ में बढ़ते हैं। हर किसी को अपने व्यक्तित्व के हिसाब से ट्रेडिंग सिस्टम बनाना पड़ता है। एसएमए व ईएमए, आरएसआई, कैंडल का पैटर्न, संस्थाओं की खरीद व बिक्री का संतुलन। कुछ तो बस इन्हीं से बाज़ार पीट डालते हैं। अब नब्ज़ मंगल के बाज़ार की…औरऔर भी

अगर आपका धन किसी और के खाते में चला जा रहा है तो ठहरकर सोचिए। दूसरे क्या करते हैं, इसके बजाय इस पर ध्यान लगाइए कि ठीक आपकी आंखों के आगे ट्रेडिंग-स्क्रीन पर क्या हो रहा है? दिन, हफ्ते, महीने या साल के चार्ट क्या बोलते हैं? आपके अगल-बगल क्या हो रहा है, इसकी तह में पहुंचने की कोशिश कीजिए। फिर शुद्ध व्यापारी/वणिक बुद्धि लगाइए। थोक के भाव खरीदिए, रिटेल के भाव बेचिए। अब सोम की संभावना…औरऔर भी

इंसान की न इच्छाओं का अंत है और न ज़रूरतों का। इसीलिए इन्हें पूरा करने में लगी नई-नई कंपनियों के आने का भी कोई अंत नहीं। जो व्यापक लोगों की ज़रूरत को जितना बेहतर पूरा करती है, वो उतनी ही सफल कंपनी बन जाती है। उपयोगी चीज़ बनाती है, जीवन में मूल्य जोड़ती है तो लोग भी उसे दाम देकर बढ़ाते जाते हैं। नतीज़तन उसके स्वामित्व/शेयर का मूल्य बढता जाता है। तथास्तु में ऐसी ही मूल्य-युक्त कंपनी…औरऔर भी

शेयरों में ट्रेडिंग और निवेश में सफलता इससे नहीं मिलती कि कितनी तेज़ सूचनाएं आप तक पहुंचती हैं या आपने कितनी पोथियां बांच रखी हैं। यहां सफलता इस बात से तय होती है कि वाजिब सूचनाएं और शिक्षा आप तक पहुंची है या नहीं। मेरे एक मित्र हैं। कुछ दिनों पहले तक फेसबुक पर निवेश व ट्रेडिंग की सलाहें खटाखट मुफ्त में दिया करते थे। लेकिन फालतू-निरर्थक निकला तो एकाउंट बंद कर दिया। अब शुक्रवार की ट्रेडिंग…औरऔर भी

फाइनेंस बाज़ार में बुल्स और बियर्स की तरह कई जानवरों के नाम चलते हैं। इनमें से एक है हॉग्स/पिग्स या हिंदी में बोलें तो सुअर। इसका अभिप्राय उन निवेशकों/ट्रेडरों से होता है जो बेहद लालची व अधीर होते हैं, ब्रोकर या वेबसाइट की ‘हॉट’ टिप पर बल्लियों उछलते हैं और रिसर्च करना या जानकारी जुटाना क्लेश समझते हैं। सुअर भले ही मुश्किल से मरे, लेकिन ‘पिग्स’ निवेशक आसानी से कुर्बान हो जाते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

लोग अक्सर सोचते हैं क्योंकि कम लोग ही ट्रेडिंग में कामयाब होते हैं इसलिए इससे पैसे कमाने की कोई बहुत ही जटिल प्रक्रिया होती होगी। तमाम दुस्साहसी लोग खुद आजमाने और जमकर घाटा खाने के बाद यह राय बनाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि हम समझ जाएं तो ट्रेडिंग एकदम सीधी-सरल चीज है। उलझने के लिए बहुत सारे जाल ज़रूर है। पर भाव ही सारा रहस्य खोलकर बहुत कुछ कह जाता है। अब मंगल की विजय…औरऔर भी

15 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक के 17 ट्रेडिंग सत्रों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में 7847.23 करोड़ रुपए (1.28 अरब डॉलर) की शुद्ध बिकवाली की, निफ्टी 2.26% गिर गया। क्या इसका मतलब यह कि मोदी प्रभाव से साल 2014 में अब तक करीब 25% बढ़ा बाज़ार ठंडा होने लगा है और विदेशी निवेशकों में निराशा घर करने लगी है? दरअसल, यह करेक्शन है बस। अब नए हफ्ते की दस्तक…औरऔर भी

एक इंसान की भावनाएं, उसका मनोविज्ञान पढ़ना बहुत मुश्किल नहीं। लेकिन जहां लाखों लोगों की भावनाएं जुड़ी हों, वो भी दया, माया या करुणा जैसे आदर्श नहीं, बल्कि धन जैसे ठोस स्वार्थ से जुड़ी हों, जहां देशी ही नहीं, विदेशी निवेशक तक शामिल हों, वहां समूह के मनोविज्ञान को पढ़ना बहुत मुश्किल है। फिर भी हम बाज़ार में इन्हें कैंडलस्टिक से पढ़ते हैं और यह रिवाज़ करीब 300 साल पुराना है। अब पढ़ते हैं शुक्र का भाव…औरऔर भी

वॉरेन बफेट जैसे धुरंधर तक हमेशा सही नहीं होते तो हम-आप किस खेत की मूली हैं। अक्सर लगातार ट्रेड सही पड़ने के बाद हम बम-बम करने लगते हैं। गुमान हो जाता है कि हम गलत नहीं हो सकते। घाटा मारता है तो उस ट्रेड से निकलने के बजाय पोजिशन बढ़ाते जाते हैं। होश तब आता है जब सारा मुनाफा उड़नछू हो जाता है। याद रखें, बाज़ार में अतिविश्वास हमेशा आत्मघाती होता है। चलिए, परखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी