रिस्क से निपटने की तैयारी न हो तो सबसे बड़ा नुकसान ज्यादा पूंजी गंवाने के अलावा यह होता है कि हम भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। ध्यान रखें कि ट्रेडिंग में सबसे प्रमुख हथियार है हमारा भावनात्मक संतुलन। अगर वो टूटा तो हम ऐसे गलत कदम उठाते हैं कि उबरने के बजाय घाटे के दलदल में धंसते चले जाते हैं। युद्ध और ट्रेडिंग में अपनी भावनाओं पर काबू रखना निहायत ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

ज़िंदगी और बाज़ार का रिस्क हम बखूबी समझते हैं। हमें समझाने की ज़रूरत नहीं। लेकिन साथ ही हम मानकर चलते हैं कि कम से कम हमारे साथ ऐसा नहीं होने जा रहा। दरअसल, यही सबसे बड़ा रिस्क है क्योंकि जब वो हमें दबोचता है तब हमारी कोई तैयारी होती और हम हालात, किस्मत या किसी दूसरे को दोष देकर रोने लगते हैं। बजाय इसके मानकर चलें कि रिस्क कभी भी घट सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो आता था, लेकिन निकलना नहीं। इसीलिए कौरव सेना के महारथियों ने उसे घेरकर मार डाला। अपने यहां भी निवेशक बाज़ार के बढ़ने पर ही कमा सकते हैं। निकलने पर कमाने का रास्ता उनके लिए बहुत उलझा और जोखिम भरा है। या तो इंट्रा-डे ट्रेडिंग या फ्यूचर्स व ऑप्शंस। साथ में स्टॉक लेंडिंग व बॉरोइंग का भी कुछ चक्कर है जो अपने-आप में बहुत उलझा हुआ है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अगर आपने किसी और के भरोसे ट्रेडिंग से कमाई करने का मंसूबा पाल रखा है तो आपको इसे कल नहीं, आज ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि जिस तरह खुद मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता, वैसे ही खुद मगजमारी किए बिना ट्रेडिंग से कमाना मुमकिन नहीं। जो लोग अचूक टिप्स देने का दावा करते हैं, वे दरअसल आपकी लालच और काहिली की भावना का इस्तेमाल कर अपनी जेब भरना चाहते हैं। आइए, अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग में भेड़चाल नहीं चलती, बल्कि यहां भेड़चाल चलनेवालों का ही शिकार किया जाता है। यहां लंबे समय में बाहरी सलाह या टिप्स का भी खास महत्व नहीं होता। यहां तो व्यक्तिगत करतब और प्रदर्शन ही काम आता है। इनपुट आप दस जगह से ले सकते हैं। लेकिन अंततः आपकी अपनी गणना और अनुशासन ही आपको लाभ दिला सकता है। याद रखें ट्रेडिंग बॉक्सिंग का खेल है, कोई फुटबॉल या हॉकी मैच नहीं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

किसी शेयर के बढ़ने या गिरने के पीछे सीधा-सा फंडा यह होता है कि उसमें ठीक उस वक्त खरीदनेवालों का पलड़ा भारी है या बेचनेवालों का। टेक्निकल एनालिसिस के तमाम संकेतकों और कैंडल के पैटर्न से भी हम यही पकड़ने की कोशिश करते हैं। मगर दिक्कत यह है कि सचमुच की खरीद-फरोख्त बने-बनाए पैटर्न में फिट बैठ जाए, यह जरूरी नहीं है। इसलिए ट्रेडिंग में पक्के की नहीं, प्रायिकता की बात चलती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हर कोई समान राय का हो जाए तो बाज़ार कभी चलेगा ही नहीं। मैं कुछ सोचता हूं तो आप उससे अलग या उलट सोचें तभी बाज़ार चल सकता है। मैंने सोचा कि बाज़ार बढ़ेगा तो खरीदूंगा। आपने सोचा कि कैसा बौडम है, बाज़ार तो गिरने जा रहा है और आप बेचेंगे। आपकी बिक्री, मेरी खरीद। दोनों से मिलकर सौदा पूरा होगा और बाज़ार चलेगा। इसलिए एक ही समय सभी सही नहीं हो सकते। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार कभी हमारे हिसाब से नहीं चलता। हमें ही बाज़ार के हिसाब से चलना पड़ता है। तभी हम उससे कमा पाते हैं। हम आगे बढ़कर अनुमान ज़रूर लगाते हैं। लेकिन मानकर चलते हैं कि अनुमान गलत भी हो सकता है। तभी तो स्टॉप-लॉस या पोजिशन साइजिंग के ज़रिए रिस्क को बांधकर चलते हैं। वैसे, लंबे निवेश के लिए अभी मौज का दौर है क्योंकि तमाम मजबूत स्टॉक्स गिरे पड़े हैं। तथास्तु में ऐसी ही एक दमदार कंपनी…औरऔर भी

हम वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग को इसीलिए चुनते हैं ताकि किसी बॉस की किटकिट न रहे। हम मालिक हों अपनी मर्जी के। आज़ाद हों। जब मन चाहे काम करें, न चाहे तो मौज करें। लेकिन यहां पहुंचते ही हम भावनाओं के गुलाम बन जाते हैं। फिर बाज़ार ऐसा धोबियापाट मारता है कि हम उठने-बैठने के काबिल तक नहीं रह जाते। अरे भाई, कमाने के लिए रोज़ाना ट्रेडिंग ज़रूरी तो नहीं! आइए, अब आखिरी दिन शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सरकारें अक्सर घबरा जाती हैं कि शेयर बाज़ार कहीं ज्यादा न गिर जाए। अपने यहां भी मोदी सरकार बाज़ार गिरते ही फौरन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को पटाने में लग जाती है। हालांकि विदेशी निवेशक ज्यादा पाने की फिराक में लगे रहते हैं और बाज़ार का खेल जारी रहता है। वैसे भी, जानकार कहते हैं कि जब चीन जैसी मजबूत सरकार शेयर बाजार को नहीं संभाल पा रही है तो भारत की क्या बिसात! अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी