ट्रेडिंग में सफलता के लिए अनुशासन ज़रूरी है और बाकी जीवन में आपके अनुशासन नहीं है तो ट्रेडिंग में उसके आने का चमत्कार अचानक नहीं घट सकता। बचपन से ही हम मनभावन चीजों के पीछे भागते और डरानेवाली चींजों से दूर भागते रहते हैं। ट्रेडिंग में अगर कामयाब होना है तो हमें उसकी उलटी आदत डालनी होगी। जब सब डरे हों तो लालच करना और जब सब लालच में हो तो डरना। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

कहते हैं कि ट्रेडिंग एक तरह का सट्टा है। यह आंशिक सच है। लेकिन बहुतेरे लोग ट्रेडिंग को सुट्टे की तरह उत्तेजना व रोमांच के लिए इस्तेमाल करते हैं। हर मिनट पर बदलने वाले भाव दिल की धड़कनें बढ़ाते हैं तो लोग दिन भर कंप्यूटर स्क्रीन से चिपके रहते हैं। हकीकत यह है कि आप डे-ट्रेडर हों या दीर्घकालिक ट्रेडर, बाज़ार से मुनाफा कमाने के लिए ट्रेडिंग पर एक घंटा लगाना पर्याप्त है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग हर किसी के लिए नहीं है। इसकी एक नहीं, अनेक वजहें हैं। जब इन सारी वजहों की काट पैदा कर लें, तभी जाकर ट्रेडिंग में उतरे। फिर भी मानकर चलें कि अपनी कांटछांट का सिलसिला बराबर जारी रहेगा। दरअसल, ट्रेडिंग एक आईना है जिसमें हमारी हर भावनात्मक कमज़ोरी झलक कर सामने आ जाती है। सच कहें तो वो हमारे स्थितिप्रज्ञ बनने की छोटी नहीं, बल्कि मैराथन दौड़ है। अब परखें सोम का व्योम…औरऔर भी

यह नियम मन में कहीं गहरे बैठा लीजिए कि वित्तीय बाज़ार में जिन ट्रेडरों का ध्यान केवल नोट कमाने पर रहता है, वे अक्सर नोट लुटाते और अपना लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर पाते। वहीं ट्रेडिंग की राह की बारूदी सुरंगों का बराबर ध्यान रखनेवाले ट्रेडर अक्सर नोट बनाते और अपना लक्ष्य पा लेते हैं। वैसे, बाज़ार को दोनों ही तरह के ट्रेडर चाहिए क्योंकि एक गंवाएगा, तभी तो दूसरा कमाएगा। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब हम वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग की तरफ लपकते हैं तो बस इतना दिखता है कि वहां धन ही धन है। न बॉस, न ऑफिस जाने का झंझट। कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफोन चालू करो। बाज़ार देखो। सौदे करो और नोट बनाते जाओ। हम यह नहीं देख पाते कि नोट तक पहुंचने की राह में कितनी बारूदी सुरंगें बिछी हुई हैं जो हमारे बैंक खाते से लेकर आत्मविश्वास तक के परखच्चे उड़ा सकती हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कंपनी जिस उद्योग या सेवा में सक्रिय है, उससे उसका स्वभाव तय होता है। जैसे मेटल, दवा, मीडिया, सीमेंट या एफएमसीजी कंपनियों की तुलना अपने उद्योग के भीतर की जा सकती है। लेकिन एक ही उद्योग के स्टॉक्स का चरित्र भिन्न हो सकता है। ट्रेडिंग के लिए हमें स्टॉक के खास चरित्र को समझना होता है जो इस बात से तय होता है कि उसमें किस तरह के निवेशक/ट्रेडर सक्रिय हैं। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिटेल ट्रेडर शेयर बाज़ार में आते-जाते रहते हैं। लेकिन देशी, विदेश निवेशक संस्थाएं बाज़ार में बराबर टिकी हुई हैं। रिट्रेल ट्रेडर हमेशा चाहता है कि बाज़ार बढ़े तो वो खरीदे और गिरे तो वो बेचे। लेकिन गौर करें तो हर दिन देशी और विदेशी संस्थाएं अमूमन एक-दूसरे से उल्टा रुख अपनाती हैं। विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं या इसका उल्टा होता है। दोनों ही सही हैं क्योंकि दोनों ही कमाते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्ट्राइक रेट के बजाय हमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात को तवज्जो देनी चाहिए। मान लीजिए कि कोई ट्रेडिंग सेवा 3:1 का रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात लेकर चलती है, यानी वो ऐसे स्टॉक्स चुनती है जो बढ़े तो 6% बढ़ सकते हैं और गिरे तो 2% पर निकल जाना होगा। दस में से ऐसे छह सौदे गलत निकले तो घाटा 12% होगा, जबकि बाकी चार सही सौदे 24% देकर जाएंगे। यानी, 40% स्ट्राइक रेट पर भी 12% फायदा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब भी हम ट्रेडिंग की कोई सेवा लेते हैं तो पहला सवाल यही पूछते हैं कि उसके सही होने की दर या स्ट्राइक रेट क्या है। लेकिन किसी समझदार ट्रेडर के लिए यह सवाल एकदम बेमानी है। दरअसल, यह ब्रोकरेज फर्मों के एनालिस्टों का मानदंड है क्योंकि इससे वे अपने को तीसमार-खां साबित करते हैं। इसके लिए वे घाटेवाले ट्रेड को लंबा खींचते और मुनाफेवाले ट्रेड को बीच में ही काट देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पांच बार सिक्का उछालने पर टेल निकला तो हमें लगता है कि छठीं बार हेड आना पक्का है। हमें अहसास नहीं कि हेड या टेल आने की प्रायिकता हमेशा 50% ही रहेगी, भले ही हज़ार क्या, लाख बार सिक्का उछाल लें। सहजबोध की यही गलती हम ट्रेडिंग में करते हैं। कई बार स्टॉस-लॉस लगता जाए तो मान बैठते हैं कि अगली बार फायदा ही होगा। यह कतई यथार्थपरक और तर्कसंगत सोच नहीं है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी