दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने कुछ दिन पहले ही सिस्टम में 200 अरब युआन या रेन्मिन्बी डाले हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार में इसका कोई असर नहीं पड़ता। वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व अगर सिस्टम में डॉलर डालता या निकालता है तो उसका बहुत बड़ा असर पड़ता है। डॉलर की उपलब्धता घटाने के लिए वह बॉन्ड की खरीद घटा सकता है। इसका सीधा-सा मतलब होगा, कोविड के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था को दिए जा रहेऔरऔर भी

नए साल का आगाज़। उम्मीद थी कि निफ्टी-50 दिसंबर 2021 की तिमाही को 17,500 से ऊपर जाकर विदा करेगा। लेकिन म्यूचुअल फंडों व देशी संस्थाओं की खरीद के बावजूद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की मुनाफावसूली ने ऐसा नहीं होने दिया। दिसंबर तिमाही में निफ्टी मात्र 1.63% बढ़ा है। मौजूदा मार्च 2022 की तिमाही में तो और ज्यादा उलट-पुलट व दबाव रह सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण है अमेरिका समेत यूरोप में बढ़ती मुद्रास्फीति और उस परऔरऔर भी

साल का आखिरी ट्रेडिंग सत्र। साथ ही जनवरी 2022 के डेरिवेटिव सौदों के चक्र का पहला दिन। एफआईआई या एफपीआई क्रिसमस की छुट्टियां मनाकर नए साल के लिए नई आवंटित पूंजी के साथ जल्दी ही हमारे बाज़ार में फिर गोता लगाएंगे ताकि मुनाफे का जखीरा यहां से निकाल सकें। यकीनन, अमेरिका से लेकर यूरोप तक में मुद्रास्फीति चरम पर है। अमेरिका में 1982 के बाद और यूरोप में 1997 में साझा हिसाब-किताब रखने के साल से सबसेऔरऔर भी

जो गया वो बीत गया। यकीनन बीतता साल शेयर बाज़ार के ट्रेडरों और निवेशकों के लिए काफी अच्छा रहा है। पांच-सात दिन के ट्रेडर भी इस दौरान दो-तीन महीने के ट्रेड से कमाने लगे। धन के बराबर बने प्रवाह में ट्रेडर मजे से तैरते रहे। बिना किसी साफ रणनीति के इफरात धन वालों ने बाज़ार से जमकर कमाया है और अब मौज कर रहे हैं। बेहद कमज़ोर स्टॉक्स को छोड़ दें तो निवेशकों ने भी अच्छा लाभऔरऔर भी

सारे लक्षण यही हैं कि नए साल में महंगाई, खासकर खाद्य मुद्रास्फीति में उछाल आ सकता है। समस्या यह भी है जिन देशों के पास खाद्य वस्तुओं की अच्छी उपलब्धता है, वे भी मुंद्रास्फीति से लड़ने की भावी योजना बनाते हुए उनका निर्यात करने से बच रहे हैं। ऐसे में हर देश को खाद्य मुद्रास्फीति से अकेले-अकेले निपटना होगा। यह सबसे लिए बड़ी कठिन चुनौती है। यह कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाज़ा संयुक्त राष्ट्र सेऔरऔर भी

संकट तब से सुलग रहा है, जब से मार्च 2020 में कोरोना से निपटने के लिए देश में लॉकडाउन लगा। मजदूर विस्थापित हो गए। जो गांव लौटे, वे वापस लौटे तो सही। मगर इधर-उधर बिखर गए। सप्लाई की कड़ियां टूट गईं। फिर पेट्रोल-डीजल के दाम। कच्चे माल से लेकर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती गई। इसके ऊपर से ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु में असंतुलन से उपजी विकराल समस्याएं। मसलन, अमेरिका के जंगलों में लगी आग। इससे कैलिफोर्निया वऔरऔर भी

दुनिया भर में चरम पर पहुंचती मुद्रास्फीति ने सरकारों को ही नहीं, इन्वेस्टमेंट बैंकरो, वित्तीय बाजार के ट्रेडरों और केंद्रीय बैंकरों तक को परेशान कर रखा है। इसमें भी सबसे खतरनाक है खाद्य मुद्रास्फीति का बेहिसाब बढ़ने जाना। खाना-पीना एक ऐसी चीज़ है जिसमें मुद्रास्फीति से उसकी मांग या खपत नहीं घटती। बेहद गरीब लोगों को छोड़ दें तो बाकी लोग खाने-पीने में कटौती नहीं कर पाते। इस पर बढ़े खर्च की भरपाई वे अन्य चीजों कीऔरऔर भी

जी हां! महंगाई का हाहाकार। भारत ही नहीं, सारी दुनिया में। लगता है कि नए साल का केंद्रीय थीम बनने जा रही है महंगाई या मुद्रास्फीति। अमेरिका में जहां रिटेल मुद्रास्फीति की दर अमूमन 2-2.5% से ऊपर नहीं जाती थी, वहां 6.8% हो चुकी है। यूरोप में यह दर 4.9% चल रही है जो यूरो अपनाने के बाद के दो दशकों का सर्वोच्च स्तर है। अपने यहां रिटेल मुद्रास्फीति नवंबर में भले ही 4.91% रही है, लेकिनऔरऔर भी

कमाल की बात है कि सरकार के कोविड टास्क फोर्स की भविष्यवाणी सरासर गलत निकली। मार्च 2020 से लेकर अब तक भारत में लगभग साढ़े तीन करोड़ कोरोना मरीज आ चुके हैं। यह भी कमाल है कि दुनिया में इस महामारी के दूसरे सबसे बड़े शिकार देश का शेयर बाज़ार साल भर में 25% से ज्यादा बढ़ गया। अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान जैसे विकसित देशों मे बेहद सस्ते ब्याज पर उपलब्ध इफरात धन भारत जैसेऔरऔर भी

व्यक्ति से बाहर समाज की बात की जाए कि साल 2020 में कोरोना की पहली लहर से लेकर साल 2021 में दूसरी लहर तक सारी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई। अब भी कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा मंडरा रहा है। भारत सरकार के कोविड टास्क फोर्स के प्रमुख वी.के. पॉल ने तो कहा है कि ब्रिटेन से लेकर फांस व यूरोप के तमाम देशों में जिस तरह ओमिक्रॉन की मार बढ़ रही है, उसे देखते हुएऔरऔर भी