निर्वाण कहीं और नहीं, इसी दुनिया, इसी जीवन में मिलता है। यह सम्यक सोच, संतुलित चिंतन और मन की शांति की अवस्था है। दूसरों का कहा-सुना काम आता है, लेकिन सफर हमारा अकेले का ही होता है।और भीऔर भी

समूची सृष्टि में हर चीज की दो गतियां होती हैं। एक अपनी धुरी पर और एक बाहर। अलग-अलग, लेकिन परस्पर जुड़ी। जो इन दोनों गतियों को साध लेता है, वही सफल साधक और सांसारिक है।और भीऔर भी

जो सबसे अच्छा है, वह लोकप्रिय भी हो, जरूरी नहीं। कहते हैं जो सबसे ज्यादा दिखता है, वही सबसे ज्यादा बिकता है। लेकिन वह सर्वोत्तम तो नहीं होता। हमें तो सर्वोत्तम चाहिए, खोटा सिक्का नहीं।और भीऔर भी

भावनाओं की दुनिया कितनी निश्छल होती है! लेकिन दुनियावाले इन्हीं भावनाओं की तह में पैठकर हमें छलने का तर्क निकाल लेते हैं। और, ज़िंदगी  का कारोबार तो तर्क से चलता है बंधुवर, भावनाओं से नहीं।और भीऔर भी

काम से काम रखने से ही काम नहीं बनता। हमारे इर्द गिर्द, दुनिया-जहान में बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा होता है जो आज नहीं तो कल हम पर असर डालता है। अपनी ही खोल में मस्त रहने का जमाना नहीं है यह।और भीऔर भी

ज्ञान एक अनुभूति है जिसके आते ही दुनिया के सारे उलझे तार सुलझ जाते हैं। लेकिन इस तक पहुंचने का कोई शॉर्टकट नहीं है। आंख और दिमाग खोल कर ही इस तक पहुंचा जा सकता है। आंखें बंद कर कतई नहीं।और भीऔर भी

औरों की भलाई में ही अपना भला है या अपने हित में ही सबका हित है? दोनों ही सोच अपने विलोम में बदल जाती हैं। इसका सबूत पहले समाजवाद के पतन और अब अमेरिका व यूरोप के संकट ने पेश कर दिया है।और भीऔर भी

हम मन ही मन तमाम टोटके करते रहते हैं। तंत्र, मंत्र, अंधविश्वास। सिक्का सीधा पड़ा तो जीतेंगे। फूल खिला तो काम हो जाएगा। ये सब कुछ और कुछ नहीं, अनिश्चितता को नाथने के हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा हैं।और भीऔर भी

मन में कोई ख्याल तभी आता है जब बाहर के संसार में उसकी जरूरत बन रही होती है। ख्याल को हकीकत बनाने में सिर्फ हमारा नहीं, बाहरी संसार का भी हित है तो वह सहयोग भी करता है। भले ही हमें न दिखे।और भीऔर भी

किसी भी चीज का ऊपर से नीचे गिरना नियति है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण जैसे नियमों को समझ जहाज बनाकर नीचे से ऊपर उड़ा देना इंसान की स्वतंत्रता है। यही है नियति की अधीनता और कर्म की प्रधानता।और भीऔर भी