आभा में जीना
हम सफल हुए बिना ही सफलता की हसीन वादियों में खो जाते हैं। महान बने बिना ही महानता की आभा में जीने लगते हैं। यह एकदम स्वाभाविक है। लेकिन इस तरह मुंगेरीलाल बनना हमारे लिए अच्छा नहीं है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
हम सफल हुए बिना ही सफलता की हसीन वादियों में खो जाते हैं। महान बने बिना ही महानता की आभा में जीने लगते हैं। यह एकदम स्वाभाविक है। लेकिन इस तरह मुंगेरीलाल बनना हमारे लिए अच्छा नहीं है।और भीऔर भी
सत्य की जीत अपने आप नहीं होती। इसके लिए थोड़े झूठ, थोड़े छल का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए ‘नरो व कुंजरो व’ पर शंख बजाना, रथ से नीचे उतरे कर्ण से छल करना और विभीषण से भेद लेना जरूरी होता है।और भीऔर भी
हर कोई अपनी-अपनी दुनिया में मस्त है। हम भी हैं। इसमें क्या बुराई! लेकिन यह तो पता होना चाहिए कि दुनिया की किन चीजों ने हमारी दुनिया को अपनी जद में ले रखा है। टिटिहरी या शुतुरमुर्ग जैसा भ्रम क्यों?और भीऔर भी
हवाई जहाज से झुग्गियां भी ज्यामितीय आकार में सजी हुई दिखती हैं। पास आने पर असलियत खुलती है। दूर से दिखता है बस तमाशा। बदलना हो तो पास जाना पड़ता है, माइक्रोस्कोप तक से देखना पड़ता है।और भीऔर भी
मन की करें तो अच्छा लगता है। लेकिन क्या अच्छा है क्या बुरा, यह मन नहीं जानता। मन तो ड्रग एडिक्ट का भी और भोजनभट्ट का भी। मन को संस्कारित करना पड़ता है। इसे छुट्टा छोड़ देना घातक है।और भीऔर भी
भावना बोली मैं सही। तर्क बोला मैं सही। भावना तर्क को उलाहना देती है कि तेरे रूखे-सूखे ज्ञान मार्ग से बाहर की दुनिया सधती है, अंदर की कलसती है। तर्क कहता है – तेरा भक्ति मार्ग सरासर मूर्खता है। तकरार जारी है।और भीऔर भी
कभी-कभी, जिसे हम किस्मत कहते हैं, वह हमारा इंतजार उस नुक्कड़ पर कर रही होती है जिसकी तरफ हम झांकना बंद कर चुके होते हैं। इसलिए उससे मुलाकात के लिए बने-बनाए फ्रेम को तोड़ते रहना पड़ता है।और भीऔर भी
असंख्य गुरु हमारे अंदर बैठे हैं और हम उन्हें बाहर तलाशते रहते हैं। कभी रहे होंगे पहुंचे हुए संत और फकीर। अभी तो सब छलिया हैं, धंधेबाज हैं। वैसे भी प्रतिभा को द्रोणाचार्य से ज्यादा उनकी प्रतिमा निखारती है।और भीऔर भी
हम शरीर में न जाने कितने रोगाणु लिए फिरते हैं। न जाने कितने वाइरस व बैक्टीरिया के कैरियर बने रहते हैं। इनसे निपट लेती है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता। लेकिन रुग्ण विचारों से निपटने का जिम्मा हमारा है।और भीऔर भी
चलते-चलते राह में तिराहे-चौराहे आते हैं। सोचते-सोचते मन में दुविधाएं आती हैं। सुलझते-सुलझते नई समस्याएं आ जाती हैं। यही तो जीवन का आनंद है दोस्त। वरना, सब एकसार रहता तो बोर नहीं हो जाते।और भीऔर भी
© 2010-2025 Arthkaam ... {Disclaimer} ... क्योंकि जानकारी ही पैसा है! ... Spreading Financial Freedom