हुनर की हर सीढ़ी को पार करने के लिए अंदर से दम भरने की, अंतःप्रेरणा की जरूरत होती है। इसका स्रोत है तो अंदर, लेकिन बाहर का बहाना चाहिए। यह बहाना कोई भगवान, गुरु या पेड़ तक कुछ भी हो सकता है।और भीऔर भी

समय की रफ्तार इतनी तेज तो नहीं हुई है कि ठीक अगले ही पल पिछले पल का होश न रहे। याददाश्त का इतना छोटा हो जाना न तो किसी व्यक्ति के लिए सहीं है और न ही कौम के लिए। इतिहास बोध जरूरी है।और भीऔर भी

दिमाग में न जाने कितने विचलन, आग्रह-दुराग्रह भरे रहते हैं हम। इसलिए कि विरासत या संयोग से मिली सुरक्षा का कवच हमें बचाए रखता है। लेकिन खुलकर खिलना है तो यह कवच तोड़कर खुले में आना होगा।और भीऔर भी

एक जगह फिसड्डी बना इंसान दूसरी जगह जाते ही चमकने लगता है। सब सही प्लेसिंग का कमाल है। संयोग कभी-कभी आपकी सही प्लेसिंग कर देता है, पर अक्सर हमें अपनी जगह खुद बनानी पड़ती है।और भीऔर भी

किसी को छोटा दिखाने से क्या फायदा! उसे छोटा दिखाने से हमारी ताकत ही घटती है, कद नहीं बढ़ता। किसी भी लकीर को छोटा दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है उसके सामने बड़ी लकीर खींच देना।और भीऔर भी

नैतिकता आसमान से नहीं टपकती। मूल्य हवा से नहीं आते। सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए कानून बनाए जाते हैं। यही कानून जब व्यापक स्वीकार्यता हासिल कर लेते हैं तो नैतिक मू्ल्य बन जाते हैं।और भीऔर भी

लय-ताल का साथ पाकर श्रम की सारी कठोरता हल्की पड़ जाती है। श्रम का रूखापन मिट जाता है, भले ही वह श्रम शारीरिक हो या मानसिक। इसलिए संगीत व श्रम की जोड़ी बड़े काम की है और जरूरी भी।और भीऔर भी

पुराने के भीतर नया पनपता रहता है। प्रकृति में पुराना हमेशा नए को जगह दे देता है। लेकिन समाज में पुराना अपनी जगह सहजता से छोड़ने को तैयार नहीं होता। इसलिए संघर्ष होता है, खून-खच्चर होता है।और भीऔर भी

चलने के लिए पैर चाहिए और पैर हमेशा जोड़े में होते हैं। कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा कितने भी। एक पैर के जीव तो पेड़ बन जाते हैं। वो बढ़ते हैं और खिलते भी। लेकिन हमेशा औरों के रहमोकरम पर।और भीऔर भी

पहले सड़क ही बनती थी। अब स्काई-ओवर भी बनते हैं। पहले जमीन से मिलती थी सुरक्षा। अब अंतर-संबंधों का मकड़जाल सुरक्षा देता है। पहले सब कुछ मूर्त था। अब बहुत कुछ अमूर्त है। वाकई बदल गया है जमाना।और भीऔर भी