जीवन की कमियां, कमजोरियां, अधूरापन जब भावनाओं का आधार होता है तो वे अच्छी होती हैं, सच्ची होती हैं। लेकिन अच्छी-सच्ची भावनाएं अक्सर विचारधाराओं की सूली चढ़ जाती हैं। ये कतई अच्छी बात नहीं है।और भीऔर भी

कोमा में जाने या मरने पर हम विचार-शून्य, भाव-शून्य, शब्द-शून्य हो जाते हैं। लेकिन क्या जीते-जी ऐसा संभव है जब हमें सिर्फ नाद सुनाई दे, जब हम सारे शब्दों-विकारों से मुक्त होकर दुनिया को देख सकें?और भीऔर भी

अब कहें, तब कहें, कब कहें, कैसे कहें – हम इसी उधेड़बुन में लगे रहे। वो शान से आया। तपाक से हाथ पकड़ा। बोला भी कुछ नहीं। बस, आंखों से हल्का-सा इशारा किया और वह उसके साथ झूमते-झामते चली गई।और भीऔर भी

परदादा से नाती तक की कड़ियां अगर जुड़ी रहें तो नाती को बाप-दादा से लेकर परदादा तक की उम्र लग जाती है और वह दीर्घायु हो जाता है। इसी निरंतरता को हम चाहें तो अपनी लंबी उम्र का सूत्र बना सकते हैं।और भीऔर भी

देश कहां से कहां पहुंचता जा रहा है और हम वहीं के वहीं अपनी चौहद्दी में सिमटे हैं! देश का काम हमारे बगैर चल सकता है, लेकिन हमारा काम उसके बगैर नहीं। इसलिए दौड़कर देश का साथ पकड़ना जरूरी है।और भीऔर भी

कोई भी काम इतना नया नहीं होता कि थोड़ा-बहुत सीखने के लिए पुराने अनुभव न हों और कोई भी काम इतना पुराना नहीं होता कि कोई खब्ती दावा कर सके कि यह काम तो हम बहुत पहले आजमा कर फेंक चुके हैं।और भीऔर भी

निर्वात कभी स्थाई नहीं होता, न अंदर न बाहर। वो बस कुछ पलों के लिए होता है क्योंकि बनते ही उसे भरने का तेज क्रम शुरू हो जाता है। वायुमंडल में हवाओं का तूफान आ जाता है तो समुंदर में लहरों का भूचाल।और भीऔर भी

ये अहम, ये ईगो हमारे अंदर का ऐसा ब्लैक होल है जो हमारा सब कुछ सोख कर बैठा रहता है। भ्रमों के जंगल से, माया के जाल से हमें निकलने नहीं देता। निकलने की कोशिश करते ही खींचकर पुनर्मूषको भव कर देता है।और भीऔर भी

औरों से झूठ बोलते-बोलते हम एक दिन अपने से भी झूठ बोलने लगते हैं। वो दिन हमारे लिए सबसे ज्यादा दुखद होता है क्योंकि तब हमारा मूल वजूद ही हमारा साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।और भीऔर भी

महान लोग कहीं आसमान से नहीं टपकते। वे हमारे-आप जैसे ही लोग होते हैं। दिक्कत यह है कि हम महानता की आभा में खोकर छाया के पीछे भागते रहते हैं। महान बनने के परिणाम को देखते हैं, प्रक्रिया को नहीं।और भीऔर भी