कितने सारे भ्रम हम पाले रहते हैं! औरों के बारे में भ्रम, अपने बारे में भ्रम। नेताओं के बारे में भ्रम, पक्ष के बारे में भ्रम, विपक्ष के बारे में भ्रम। भ्रमों का जाल। संशयात्मा न बनें। पर अविश्वास करना तो सीखें।  और भीऔर भी

आपके मानने या चाह लेने से कुछ नहीं होगा। हाय-तौबा मचाना निरर्थक है। पहले जो है, जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार कीजिए। अगली यात्रा वहीं से शुरू होगी। सीमाएं समझकर ही सीमाएं तोड़ी जाती हैं।और भीऔर भी

मां-बाप की उंगली, घर की छांह, कभी नौकरी का साया और फिर भगवान का आसरा। इन बैसाखियों से कभी तो तौबा कीजिए। कभी तो एकदम अनाथ होकर देखिए कि आपका अपना शक्ति-पुंज क्या है!और भीऔर भी

जान भर लेना अपने-आप में पर्याप्त नहीं। लेकिन जानना वह कड़ी है जिससे कर्म की पूरी श्रृंखला खुलती चली जाती है। सच का ज्ञान हमें इतना बेचैन कर देता है कि हम चाहकर भी शांत नहीं बैठ सकते।और भीऔर भी

कोई काम अनंत समय तक नहीं टाला जा सकता। शुरुआत कभी तो करनी ही होगी क्योंकि आदर्श हालात कभी नहीं बनते, शुभ घड़ी कभी नहीं आती। जब भी शुरू कर दें, घड़ी टिक-टिकाने लगेगी।और भीऔर भी

किसी मूर्ख को आसानी से खुश किया जा सकता है। बुद्धिमान को खुश करना और भी आसान है। लेकिन अपने ‘ज्ञान’ पर मुग्ध लोगों को ब्रह्मा भी खुश नहीं कर सकते। इसलिए इनके मुंह नहीं लगना चाहिए।और भीऔर भी

यूं तो हम सभी अंदर से सूरज की तरह तेजस्वी व मेधावी होते हैं। लेकिन बचपन से लेकर बड़े होने तक जमाने से मिले काले मेघ उसे घेर लेते हैं। चाहें तो हम हर मेघ को मेहनत-मशक्कत से काट सकते हैं।और भीऔर भी

जीत का मतलब यही क्यों होता है कि हम कितनों को पीछे छोड़ आगे निकल गए? जीत का मतलब यह क्यों नहीं होता कि कितने लोगों के साथ हमारा दिल धड़कता है, कितनों का दुख हमें अपना लगता है?और भीऔर भी

जब तक जिंदा हूं, देख-सुन सकता हूं, तब तक जहां तक निगाहें, वहां तक फतेह। घर छीन लो, समाज छीन लो। लेकिन प्रकृति को कौन मुझसे छीन सकता है? वो तो जन्म से मेरी है और मरने पर भी रहेगी।और भीऔर भी

जब समय का कोई अंत नहीं, तब संभावनाओं का अंत कैसे हो सकता है? हां, पुराने से चिपके रहने का कोई तुक नहीं। सबक लेकर नए को आजमाना जरूरी है। तब तक, जब तक जीवन शेष है, समय शेष है।और भीऔर भी