इतने कम में काम कैसे चला लेते हो भाई! जरूरतें बढ़ाओ और उनको पूरा करने का पुरुषार्थ करो। नहीं तो जिंदगी यूं ही अकारथ चली जाएगी और आप जहां से चले थे, वहीं तक सिकुड़े रह जाएंगे।और भीऔर भी

दया, ममता व करुणा किसी और के कल्याण से ज्यादा अपनी संतुष्टि के भाव हैं। इसलिए दीन-हीन और कमजोर बनकर दुनिया नहीं जीती जा सकती। अपनी दुनिया औरों के भरोसे नहीं चल सकती।और भीऔर भी

खुद कोई अपने संदर्भ में कैसे गलत हो सकता है? नाक कैसे बता सकती है कि वह टेढ़ी है? दूसरों का संदर्भ ही बताता है कि हम सही हैं या गलत। इसलिए, खुद को हमेशा दूसरों के नजरिए से देखना चाहिए।और भीऔर भी

ज्ञान के लिए विनम्रता जरूरी है। तभी आप बच्चों जैसा कुतुहल लेकर ज्ञान की अनंत दुनिया में हतप्रभ रह सकते हैं। लेकिन विनम्रता में खुद को जो कमजोर दिखा दिया तो यह दुनिया आपको खा जाएगी।और भीऔर भी

स्वांतः सुखाय कुछ नहीं। तुम दूसरों के लिए काम करो। दूसरे तुम्हारा ख्याल रख लेंगे। लेकिन तभी, जब दूसरों को समझ में जाएगा कि आप उनके लिए जो काम कर रहे हैं, वो वाकई उनके काम का है।और भीऔर भी

कोंपल फूटती है तो बड़ी ही बेचैन होती है। फौरन उसे किसी तलब की, तसल्ली की जरूरत होती है। खटाखट बढ़ने व खिलने के दौर में हमारे साथ भी यही होता है। संभले नहीं तो नशा हमें धर दबोचता है।और भीऔर भी

आप सौभाग्यशाली हैं जो असंतुलन से संतुलन तक पहुंचने का माध्यम बन रहे हैं। बड़ी किस्मत वाले हैं जो नवसृजन के काबिल समझे गए। लेकिन बीड़ा उठाने से पहले से जान लें कि यह राह भयंकर पीड़ादायी है।और भीऔर भी

नजर खराब हो तो कुछ साफ नहीं दिखता। नजरिया गलत हो तो घर से लेकर बाहर, छोटी से लेकर बड़ी चीज तक के बारे में इंसान गलत धारणाओं का शिकार रहता है। एक जगह सही तो सब जगह सही।और भीऔर भी

जब औरों की आशाएं आपसे जुड़ जाती हैं तो जीत या हार सिर्फ आपकी नहीं होती। वह अपने-पराए उन तमाम सामान्य जनों की होती है जो खुद लड़ नहीं सकते लेकिन आपके साथ मर जरूर सकते हैं।और भीऔर भी

जब तक सब कुछ हासिल है, हम खुद को भगवान का राजकुमार माने बैठे रहते हैं। भूल जाते हैं कि यहां कुछ भी अपने-आप नहीं मिलता। हमें जो भी मिला है, वह हमारे अग्रजों-पूर्वजों के कर्मों का फल है।और भीऔर भी