यहां किसी कर्ता की जरूरत नहीं। ऑटो-पायलट मोड में है सब कुछ। आज से नहीं, जब से सृष्टि बनी, तब से। संरचनाएं जटिल होती गईं। नए भाव बनते गए। लेकिन चलता रहा ऑटो-पायलट मोड।और भीऔर भी

बड़ी-बड़ी मंजिलों के चक्कर में क्यों पड़ते हैं? अरे! छोटी-छोटी मंजिल बनाएं और वहां तक चलने का मजा लें। बहुत सारे झंझटों और तनावों से मुक्त रहेंगे। साथ ही नई-नई मंजिलें भी फोकट में मिलती रहेंगी।और भीऔर भी

वही-वही जुमले। वही-वही बात। बहते पानी में ऐसा हो नहीं सकता! वह तो निर्मल होता है। बास तो हमेशा ठहरे पानी से ही आती है। इसलिए देखें तो सही कि बातों की बास के पीछे आपका ठहराव तो नहीं!और भीऔर भी

थोड़ा करो, बाकी होने दो। देखो तो सही कि हम ही नहीं, बहुत-सी लौकिक शक्तियां सक्रिय हैं इस बाह्य जगत में। उनको जान सको तो जानो। नहीं तो उनकी लीला देखो और अचंभित होते रहो।और भीऔर भी

इतने कम में काम कैसे चला लेते हो भाई! जरूरतें बढ़ाओ और उनको पूरा करने का पुरुषार्थ करो। नहीं तो जिंदगी यूं ही अकारथ चली जाएगी और आप जहां से चले थे, वहीं तक सिकुड़े रह जाएंगे।और भीऔर भी

दया, ममता व करुणा किसी और के कल्याण से ज्यादा अपनी संतुष्टि के भाव हैं। इसलिए दीन-हीन और कमजोर बनकर दुनिया नहीं जीती जा सकती। अपनी दुनिया औरों के भरोसे नहीं चल सकती।और भीऔर भी

खुद कोई अपने संदर्भ में कैसे गलत हो सकता है? नाक कैसे बता सकती है कि वह टेढ़ी है? दूसरों का संदर्भ ही बताता है कि हम सही हैं या गलत। इसलिए, खुद को हमेशा दूसरों के नजरिए से देखना चाहिए।और भीऔर भी

ज्ञान के लिए विनम्रता जरूरी है। तभी आप बच्चों जैसा कुतुहल लेकर ज्ञान की अनंत दुनिया में हतप्रभ रह सकते हैं। लेकिन विनम्रता में खुद को जो कमजोर दिखा दिया तो यह दुनिया आपको खा जाएगी।और भीऔर भी

स्वांतः सुखाय कुछ नहीं। तुम दूसरों के लिए काम करो। दूसरे तुम्हारा ख्याल रख लेंगे। लेकिन तभी, जब दूसरों को समझ में जाएगा कि आप उनके लिए जो काम कर रहे हैं, वो वाकई उनके काम का है।और भीऔर भी

कोंपल फूटती है तो बड़ी ही बेचैन होती है। फौरन उसे किसी तलब की, तसल्ली की जरूरत होती है। खटाखट बढ़ने व खिलने के दौर में हमारे साथ भी यही होता है। संभले नहीं तो नशा हमें धर दबोचता है।और भीऔर भी