हम जैसे-जैसे बढ़ते हैं, सामाजिक होते जाते हैं, वैसे ही वैसे हमारे पूर्वाग्रह बढ़ते जाते हैं। हार्मोंस के आग्रह इन पूर्वाग्रहों के साथ मिलकर मायाजाल बना देते हैं। सही शिक्षा का काम इसी मायाजाल को काटना है।और भीऔर भी

बड़ा ओहदा, बड़ी कुर्सी, बड़ा नेटवर्क। लेकिन असल में आप कितने बड़े हैं, यह इससे तय होता है कि आपको नितांत अपनों से कैसी आत्मीयता व सम्मान मिलता है। वही आपकी थाती है। बाकी सब भौकाल है।और भीऔर भी

एक दिन में महल नहीं बनते। एक दिन में क्रांतियां नहीं होतीं। एक दिन में कोई ज्ञानवंत नहीं बनता। एक दिन में जितना मिला, वही अपना है। जो छूट गया, उसे फिर पकड़ लेंगे। उसको लेकर पछताना क्या?और भीऔर भी

जो मनोरंजन हमारी पशु-वृत्तियों को पोसता है, वो कभी हमें आगे नहीं ले जा सकता। सार्थक मनोरंजन वही है जो बतौर इंसान हमें ज्यादा संवेदनशील बनाए, एकाकीपन से निकालकर ज्यादा सामाजिक बनाए।और भीऔर भी

जिसके हाथ-पांव बंधे हैं, दिल-दिमाग अंधेरी खोह में निर्वासित है, उसके लिए आज क्या और कल क्या! जब जिंदगी ही नहीं है तो आज की रात को आखिरी रात मान भी ले तो दिन को जी कहां पाएगा?और भीऔर भी

जो चीज सालों से नहीं बदली, उसे बदलने का सुख ही सृजनात्कता का सुख है। बदलने की ललक हो, जीवट हो तो अंदर से ऊर्जा के बुलबुले उठते हैं। ये बुलबुले खुशी की चहक व ताजगी साथ लेकर आते हैं।और भीऔर भी

सर पर किसी का साया रहे तो जमकर उछल-कूद मचाई जा सकती है। मां-बाप के साये में बच्चा यूं ही बढ़ता है। लेकिन पौधे को छाया में रखते ही उसके सारे पत्ते धीरे-धीरे गिर जाते हैं और वो सूख जाता है।और भीऔर भी

हर तरफ बुरा ही बुरा है। सब कुछ टेढा-मेढा है। यह सोच-सोच कर रोने का कोई अंत नहीं है। देखना और सोचना यह चाहिए कि जो बुरा है, वो वैसा क्यों है। यह सिरा पकड़ कर ही हम उसे अच्छा कर सकते हैं।और भीऔर भी

आपकी नजर ही हद क्या है? कहां तक देख पाते हो आप? अपने तक, परिवार तक, समुदाय तक, समाज तक, देश-दुनिया तक या हर तरफ फैली प्रकृति तक। इसी से तय होता है आपके सुखी होने का स्तर।और भीऔर भी

जब तक आप कच्चे हो तब तक लेते ज्यादा और देते कम हो। परिपक्व होने जाने पर आप देते ज्यादा और लेते कम हो। लेकिन परिपक्वता ठहरनी नहीं चाहिए क्योंकि रुकने से आप रूढ़ और बेकार हो जाते हो।और भीऔर भी