विचारों के बुलबुलों या गुब्बारों से कुछ नहीं होनेवाला। वे तो बनते, फूलते और फूट जाते हैं। हमें तो ऐसे स्थाई व पुख्ता विचारों की जरूरत है जो वायुयान की तरह टेक-ऑफ कर हमें नई ऊंचाई पर ले जा सकें।और भीऔर भी

हमारा काम बस इतना है कि हम बीज और मिट्टी को, आग और घी को, सिद्धांत व व्यवहार को, भगवान व इंसान को खींचकर एकदम करीब ले आएं। बाकी काम प्रकृति व समाज के नियम अपने आप कर लेंगे।और भीऔर भी

जब हमें लगता है कि हम तो निमित्त मात्र  हैं और हमारे पीछे कोई बड़ी शक्ति काम कर रही है तो हम मां की गोद में पड़े बच्चे की तरह बेधड़क किलकारियां मारने लगते हैं। आस्था का यही फायदा है।और भीऔर भी

अपनी इच्छाओं को आरोपित करने के बजाय हमें उन्हें यथार्थ के हिसाब से सजाना चाहिए। यथार्थ सतह से उभरा अंकुर ही नहीं, सतह के नीचे पड़ा बीज भी होता है। इसी त्रिकाल दृष्टि से पूरी होती हैं इच्छाएं।और भीऔर भी

हम सही सवाल पूछना शुरू कर दें तो समझिए कि सच तक पहुंचने की हमारी आधी यात्रा पूरी हो गई। लेकिन हम तो ‘होता है, चलता है’ की सोच के ऐसे आदी हो गए हैं कि चौंकते ही नहीं, सवाल ही नहीं पूछते।और भीऔर भी

जो चीजें प्रिय हों, उनकी उपेक्षा कतई नहीं की जानी चाहिए। उनकी देखरेख नहीं टाली जा सकती। नहीं तो गर्द-गुबार और समय के झंझावातों में वे ऐसी गुम हो जाती हैं कि लाख खोजने पर भी नहीं मिलतीं।और भीऔर भी

भग्न पृष्ठ कटि ग्रीवा, बद्ध दृष्टिः अधोमुखी। कष्टेन लिखितम् शास्त्रम्, यत्नेन परिपालय। बड़ी मेहनत व कष्ट से हासिल होता है ज्ञान। इसका मूल्य समझना चाहिए। बड़े यत्न से संभालना चाहिए।और भीऔर भी

काहिल और कामचोरों का कभी कुछ नहीं हो सकता। बाकी हर किसी को अगर मन का काम मिल जाए और उससे उसका घर-परिवार भी चल जाए तो वह काम में ऐसा रमेगा कि कभी छुट्टी ही नहीं मांगेगा।और भीऔर भी

वजह चाहे जो भी हो, इस सृष्टि में सभी चीजें गोल हैं, सीधी नहीं। लेकिन हमारी नजरें सीधी देखती हैं। इसलिए हमारा क्षितिज हमेशा बंधा रहता है। पूरा सच देखने के लिए सतह से ऊपर उठना जरूरी है।और भीऔर भी

गुमान रहता है कि हम ये कर डालेंगे, वो कर डालेंगे। हालात से टकराकर हकीकत सामने आती है तो हम जीरो बन जाते हैं। लेकिन यही जीरो जरूरी जज्बे का साथ पाकर आपको फिर से हीरो बना सकता है।और भीऔर भी