जब तक जिंदा हूं, देख-सुन सकता हूं, तब तक जहां तक निगाहें, वहां तक फतेह। घर छीन लो, समाज छीन लो। लेकिन प्रकृति को कौन मुझसे छीन सकता है? वो तो जन्म से मेरी है और मरने पर भी रहेगी।और भीऔर भी

जब समय का कोई अंत नहीं, तब संभावनाओं का अंत कैसे हो सकता है? हां, पुराने से चिपके रहने का कोई तुक नहीं। सबक लेकर नए को आजमाना जरूरी है। तब तक, जब तक जीवन शेष है, समय शेष है।और भीऔर भी

किसी शिखर पर पहुंचने से ज्यादा अहमियत इस बात की है कि आप जो काम कर रहे हैं, उससे संतुष्ट हैं कि नहीं, वह आपको सार्थक लगता है कि नहीं। अगर हां तो फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं।और भीऔर भी

समस्याएं आती हैं, लेकिन अपने भीतर नए अवसरों को भी छिपाकर लाती हैं। जो लोग समस्याओं के व्यूह को तोड़ते हैं, वे ही अवसरों के मुंहाने तक पहुंचते हैं, जहां से सफलता की मंजिल ज्यादा दूर नहीं होती।और भीऔर भी

हिसाब लगाएं तो पता चलेगा कि हम तीन चौथाई से ज्यादा जीवन प्रतिक्रिया में जीते हैं। लेकिन प्रतिक्रिया नहीं, क्रिया-प्रधान जीवन होना चाहिए हमारा। दूसरे नहीं, हम ही तय करें कि हमें क्या करना है।और भीऔर भी

जमाना हम से है, हम जमाने से नहीं – जैसी बातें मुंह फुलाकर हनुमान बनने से ज्यादा कुछ नहीं। जमाना हमारे बगैर भी चलता है और चलता रहेगा। हमें जमाने को समझने की जरूरत है, न कि जमाने को हमें।और भीऔर भी

हर सजीव वस्तु या रिश्ते का पोर-पोर बेहद बारीक तंतुओं से जुड़ा होता है। एक भी तंतु हिल जाए तो उससे उपजी तकलीफ हमें अंदर तक हिलाकर रख देती है और, तब हमें उसके होने का अहसास होता है।और भीऔर भी

पुश्तैनी पेशे का जमाना अब नहीं रहा। सोनार का बेटा, लोहार का बेटा लोहार या किसान का बेटा किसान बनें, जरूरी नहीं। फिर धर्म क्यों पैतृक संपदा या पुश्तैनी जागीर के रूप में हम पर मढ़ दिया जाता है?और भीऔर भी

क्लोन तो दोहराव है। उसमें सृजन कहां? जब प्रकृति के संसर्ग से नए से नया सृजन कर सकते हैं तो क्लोन पर मशक्कत क्यों? नियमों को समझकर प्रकृति के बीच रचने का आनंद प्रयोगशालों में नहीं मिलता।और भीऔर भी

जब हम जवान होते हैं तो छोटी सी छोटी बात पर मरने पर उतारू हो जाते हैं। बूढ़े होते जाते हैं तो बड़ी सी बड़ी बात होने पर भी जीते रहना चाहते हैं। उम्र इफरात तो कोई भाव नहीं! उम्र कम तो इतना मूल्य!!और भीऔर भी