सकल पदारथ है जगमाँही, कर्महीन नर पावत नाहीं। लेकिन कर्म से पहले यह तो पता होना चाहिए कि आखिर हमें चाहिए क्या। इसके लिए ज्ञान जरूरी है। ज्ञान से हमारी दुनिया खुलकर व्यापक हो जाती है और हम सही चयन कर पाते हैं।और भीऔर भी

दिन की शुरुआत इससे करें कि किस-किस के प्रति कृतज्ञ हैं तो दिन बड़ा अच्छा गुजरता है। कृतज्ञता का भाव हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल का संचार करता है, जबकि नाराजगी का भाव हमें शिथिल और कमजोर बना देता है।और भीऔर भी

लंबे समय तक किसी गफलत में जीना न खुद के लिए अच्छा है और न ही औरों के लिए। धीरे-धीरे झलकने लगता है कि हम कितने भ्रम में पड़े हुए थे। लेकिन अपनी जिद और जड़ता के कारण हम सच को स्वीकार करने से भागते रहते हैं।और भीऔर भी

विचार आग से निकली चिनगारियों की तरह हैं। उड़ते हैं, मिट जाते हैं। पकड़कर नहीं रख सके तो क्या पछतावा! जरूरी यह है कि जिस आग से वो निकली है, उसे बचाकर रखा जाए। वो सलामत रही तो विचार शब्द बदल-बदलकर आते ही रहेंगे।और भीऔर भी

पहले ही बाधाओं की सोचने लगे तो बाधाओं के इतने बुलबुले फूट पड़ेंगे कि चलना ही रुक जाएगा। आकस्मिकता का इंतजाम होना चाहिए। विफल हो गए तो क्या करेंगे, इसका भी आभास होना चाहिए। पर, मंजिल तो चलने से ही मिलेगी।और भीऔर भी

जब तीन-तीन सत्ताएं आपके भीतर हैं तो बाहरी सत्ता के फेर में क्यों पड़ना! मन ही मन मातृसत्ता, पितृसत्ता और गुरुसत्ता को साध लिया जाए तो आशीर्वाद व प्रेरणा का ऐसा निर्झर अंदर से बहता है कि कहीं और माथा झुकाने की जरूरत नहीं।और भीऔर भी

संघर्ष तो एक ही है घर से लेकर दफ्तर और व्यापक समाज तक। वो यह कि जो मेहनत करते हैं, उन्हें उनका वाजिब श्रेय कैसे दिलाया जाए। घर में महिला को, फैक्टरी में कामगार को, दफ्तर में कर्मचारी को और राजनीतिक पार्टी में कार्यकर्ता को।और भीऔर भी

शरीर है, तभी सब है। घर-परिवार। सुख-समृद्धि। ज्ञान-ध्यान। सबकी शुरुआत इसी से होती है और इसी के साथ इससे जुड़े हर भाव का अंत हो जाता है। बर्तन ही नहीं तो अमृत रखेंगे कहां? इसलिए सबसे पहले शरीर की शुद्धता व पात्रता जरूरी है।और भीऔर भी

हम बहुत सारी चीजों को देखते हुए भी देख नहीं पाते क्योंकि उन्हें हम सरसरी व सामान्य नज़र से देखते हैं। हमें उनकी विशिष्टता का बोध नहीं होता। उसी तरह जैसे सब कुछ समान होते हुए भी घोड़े, कुत्ते और चूहे को अलग-अलग दिखता है।और भीऔर भी

इस दुनिया में हम अकेले ही आए हैं और अकेले ही जाएंगे। हमें जो भी करना है, अकेले ही करना है। इसमें घर-परिवार, दोस्त या समाज का कोई अन्य सदस्य योगदान करता है तो यह उसकी मेहरबानी है। हमें इसके लिए उसका कृतज्ञ होना चाहिए।और भीऔर भी