भक्त: हे भगवान! मेरी मनोकामना है कि ये बाजार चढता जाए तो अच्छा रहे। बाजार में किसान, मजदूर आदि सभी ने तरह-तरह के अच्छे अच्छे शेयर ले रखे हैं। इन ईमानदार मेहनती लोगों की गाढ़े पसीने की कमाई अमीर लोग वैसे ही हजम कर जाना चाहते हैं जैसे खड़ी सब्जी की फसल पर किसान को व्यापारी हजम कर जाना चाहता है। (वह कहता है कि सस्ते में फसल बेचो, वरना मैंने तो माल खरीदना नही है, औरऔरऔर भी

laxmi and begum

आपने भी देखा होगा। मैंने भी देखा है। सड़क के किनारे, गली के नुक्कड़ पर, बस अड्डों के पास, ट्रेन के डिब्बों में कभी-कभी एक आदमी नीचे बैठा ताश के छह पत्तों को उल्टी तरफ से दो-दो की जोडियों में खटाखट तीन सेट में रखता जाता है। आसपास कम से कम तीन लोग खड़े रहते हैं जो उसे घेरकर दांव लगाते हैं। दांव यह होता है कि जिसके बताए पत्ते के पलटने पर बेगम निकलेगी, उसके सौऔरऔर भी

इस समय पूंजी बाजार से रिटेल निवेशक या आम निवेशक कन्नी काट चुके हैं। सेकेंडरी बाजार या शेयर बाजार में उनका निवेश लगभग सूख चुका है। दूसरी तरफ, जो प्राइमरी बाजार कुछ साल पहले तक आम निवेशकों का पसंदीदा माध्यम बना हुआ था, वहा भी अब आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफर) व एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) में लोगबाग पैसे नहीं लगा रहे हैं। लगाएं भी तो कैसे। कमोबेश हर आईपीओ या एफपीओ लिस्ट होने के बाद इश्यू मूल्यऔरऔर भी

सोमवार से लेकर शुक्रवार तक यह सिलसिला चलता है। 8 बजे सुबह से ‘राइट-टाइम’ शुरू हो जाता है और शाम को 3.30 बजे बाजार बंद होने तक चलता रहा है। हिंदी-अंग्रेजी के बिजनेस चैनलों पर तथाकथित एनालिस्ट डट जाते हैं। इस अंदाज में बोलते हैं जैसे सारा बजार उन्हीं की उंगलियों के इशारे पर चलता है, एकदम ज्योतिषी की तरह। खरीद, बिक्री और स्टॉप लॉस। इसे खरीदो, इसे बेचो और इतने पर स्टॉप लॉस लगा दो। लगऔरऔर भी

अगर अपने शेयर बाजार को आम लोग जुए का अड्डा या कैसिनो जैसा मानते हैं तो यह निराधार नहीं है क्योंकि अब भी रोज ब रोज के तीन चौथाई से ज्यादा सौदों में शेयरों की असली लेन-देन नहीं होती। बस भाव का अंतर ले-देकर कमाई हो जाती है। हमारे टीवी चैनल, बिजनेस अखबार, वेबसाइट भी यही ज्ञान देते रहते हैं कि कितने पर खरीदो, कितने पर बेचो और कहां स्टॉप लॉस लगाना है यानी, दिन के दिनऔरऔर भी

महंगाई हकीकत है। मुद्रास्फीति आंकड़ा है। औसत है। और, औसत अक्सर कुनबा डुबा दिया करता है। खैर वो किस्सा है। हम जानते हैं कि कोई चीज महंगी तब होती है जब उसकी मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाती है। कई साल पहले जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने कहा था कि दुनिया में अनाज की कीमतें इसलिए बढ़ी हैं क्योंकि चीन और भारत में अब भूखे-नंगे लोगों के पास खरीदने की ताकत आ गई है। ऐसी ही बात हालऔरऔर भी

शेयर बाजार में सर्किट का खेला हर दिन चलता है। जैसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) में 7 अप्रैल को 356 शेयरों पर सर्किट ब्रेकर लगा था, जिसमें से 274 पर अपर सर्किट और 82 पर लोअर सर्किट लगा हुआ था। सोमवार को शिवालिक बाईमेटल पर अपर सर्किट लगा तो बुधवार को कावेरी टेलिकॉम पर। शेयर कहीं ज्यादा उछल-कूद न मचाएं, इसके लिए हमारी पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने सर्किट लगाने का नियम बना रखा है। यहऔरऔर भी

मोटे तौर पर कहा जाए तो बाजार में शेयर के भाव किसी भी दूसरे सामान की तरह डिमांड और सप्लाई या मांग और उपलब्धता से तय होते है। अगर निवेशक मानते हैं कि इस कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है या वह आगे भी काफी अच्छा काम करेगी तो वे उस शेयर को खरीदने में जुट जाते हैं। अब चूंकि एक खास समय पर कंपनी द्वारा जारी किए शेयरों की संख्या और ट्रेडिंग के उपलब्ध शेयरों कीऔरऔर भी

मिहिर शर्मा एक नौकरीपेशा शख्स हैं। कुछ साल पहले तक महीने की तनख्वाह 35 हजार रुपये थी। अब यही कोई 65 हजार पाते हैं। पहले कैश सेगमेंट में सीधे कंपनी के शेयर खरीदते थे, डिलीवरी लेते थे। मौका पाने पर बेचकर हजार-दो हजार की कमाई कर लेते थे। जनवरी 2008 के बाद अपने ढाई लाख के निवेश पर करीब डेढ़ लाख का घाटा खाने के बाद उन्होंने रणनीति बदल दी है। अब वे सीधे कंपनी के शेयरोंऔरऔर भी

दुनिया भर में साल 2009 को ऐसा साल माना जाएगा जब लाखों आम लोगों को अपने घर-बार और नौकरी-चाकरी से हाथ धोना पड़ा। लेकिन हाल ही जारी फोर्ब्स पत्रिका की लिस्ट के मुताबिक दुनिया में खरबपतियों की संख्या साल भर पहले की 793 से करीब डेढ़ गुनी होकर 1011 हो गई है। इसमें भी उन हेज फंडों की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है जिनकी वजह से वैश्विक वित्तीय संकट ने आग पकड़ी थी। फोर्ब्सऔरऔर भी