बेस रेट जुलाई से, पुराने कर्ज को बदलने पर फीस नहीं

बेस रेट पर रिजर्व बैंक के अंतिम दिशा-निर्देश जारी, एक जुलाई से बीपीएलआर की व्यवस्था खत्म, शुरू होगी बेस रेट प्रणाली, दो लाख तक के ऋण पर ब्याज की बंदिश बैंकों से हटी, किसानों व गरीब तबकों के डीआरआई एडवांस पर बेस रेट की शर्तें लागू नहीं…

पहली जुलाई 2010 से देश का कोई भी बैंक किसी भी ग्राहक को कैसा भी कर्ज एक निश्चित दर से कम ब्याज पर नहीं दे सकता। इस दर को बेस रेट का नाम दिया गया है। लेकिन यह बेस रेट हर बैंक अपने स्तर पर तय करेगा। इसलिए अलग-अलग बैंकों की यह न्यूनतम ब्याज दर अलग-अलग हो सकती है। रिजर्व बैंक ने आज बेस रेट पर जारी अपने अंतिम दिशानिर्देश में यह व्यवस्था दी है। जुलाई से बेस रेट के लागू होते ही साल 2003 से चल रही बीपीएलआर (बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट) की प्रणाली खत्म हो जाएगी। नई प्रणाली को अपनाना सुगम बनाने के लिए तय किया है कि जिन्होंने बीपीएलआर से जुड़ी ब्याज दर पर पहले से ऋण ले रखे हैं, उनसे अदायगी की बाकी बची मीयाद तक पुराने तरीके से ब्याज लिया जा सकता है। लेकिन अगर कर्जदार ऋण के मौजूदा करार के बीच में ही बेस रेट की नई व्यवस्था का लाभ पाना चाहता है तो आपसी रजामंदी से तय शर्तों पर बैंक उसे यह मौका दे सकता है। इस स्विच-ओवर के लिए बैंक को ग्राहक से कोई फीस नहीं लेनी चाहिए।

यह वैसे तो रिजर्व बैंक ने बेस रेट पर दिशानिर्देश या गाइडलाइंस जारी किए हैं, इसलिए इन्हें बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। इसमें रिजर्व बैंक ने हर जगह चाहिए या हो सकता का इस्तेमाल किया है। लेकिन आपसी होड़ के कारण हर बैंक इसका पालन करेगा क्योकि वह दूसरे बैंक से पीछे नहीं रहना चाहेगा। बेस रेट लागू होने के साथ बीपीएलआर प्रणाली से जुड़ी वह शर्त भी खत्म हो जाएगी कि बैंक दो लाख रुपए या उससे कम राशि के ऋण अपनी बीपीएलआर से ज्यादा ब्याज नहीं ले सकते। इससे बैंक अब दूरदराज के इलाकों या गरीब लोगों के बीच अपना जाल फैला रही माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को कड़ी टक्कर दे सकेंगे। माइक्रो फाइनेंस संस्थाएं ऐसे ऋणों पर सालाना 35 फीसदी से लेकर 360 फीसदी (100 रुपए पर 1 रुपए रोज) तक ब्याज लेती हैं। बैंक अब इस तरह के छोटे ऋणों पर थोड़ा कम ब्याज लेकर माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को झटका दे सकते हैं।

रिजर्व बैंक ने बेस रेट के दिशानिर्देश अपनी कार्यकारी निदेशक दीपक मोहंती की अध्यक्षता में बने कार्यदल की रिपोर्ट और उस पर आई प्रतिक्रियाओं के आधार पर तैयार किए हैं। इस कार्यदल ने अक्टूबर 2009 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी। उसके बाद इसे आम प्रतिक्रिया के लिए रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर डाल दिया गया। फिर फरवरी 2010 में इससे जुड़े दिशानिर्देशों का प्रारूप पेश किया गया और सभी पक्षों से मिली राय की काट-छांट के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया है। रिजर्व बैंक का कहना है कि बीपीएलआर व्यवस्था में बैंक अपने ऋण इससे कितनी भी कम या ज्यादा ब्याज पर दे सकते थे। इससे न तो रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति संबंधी फैसले नीचे पहुंचते थे और न ही बैंकों की ब्याज दरों में कोई पारदर्शिता थी।

बता दें कि दीपक मोहंती ने पिछले साल अगस्त माह में निजी बातचीत में बताया था कि बैंकों के 78 फीसदी ऋण बीपीएलआर से कम ब्याज पर दिए जा रहे हैं। रिजर्व बैंक का कहना है कि बेस रेट लागू करने से बैंकों की उधार दरों में पारदर्शिता आएगी। साथ ही मौद्रिक नीति के फैसलों को ग्राहक के स्तर तक पहुंचने में आसानी हो जाएगी। अंतिम दिशानिर्देश में तय किया गया है कि बैंक रेट की व्यवस्था हर तरह के ऋण और हर तरह के कर्जदार पर लागू होगी। यह दर एक ही बैंक के अलग-अलग अवधि के ऋणों पर अलग हो सकती है उसी तरह जैसे बैंक अभी अलग मीयाद की एफडी पर अलग-अलग ब्याज देते हैं। लेकिन इस गणना में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। रिजर्व बैंक ने बैंकों की हर तरह की फंड लागत और लाभ मार्जिन जैसे कारकों को शामिल करते हुए बैंक रेट निकालने का एक फॉर्मूला सुझाया है। लेकिन बैंक चाहें तो दूसरा तरीका भी अपना सकते हैं, बशर्ते उस पर रिजर्व बैंक से स्वीकृति ले ली जाए।

बैंक अपनी बेस रेट के आधार पर ऋण व अग्रिम की वास्तविक ब्याज दरें तय कर सकते हैं। इसमें वे किसी खास कस्टमर से अतिरिक्त शुल्क भी जोड़ सकते हैं। लेकिन किसी भी सूरत में वास्तविक ब्याज दर बेस रेट या आधार दर से कम नहीं होनी चाहिए। नई व्यवस्था को अपनाने में बैंकों को परेशानी न हो, इसके लिए तय किया है कि वे शुरुआती छह महीनों में यानी दिसंबर 2010 के अंत तक इस रेट को निकालने का तरीका कितनी भी बार बदल सकते हैं। लेकिन उसके बाद उन्हें यह छूट नहीं मिलेगी। बेस रेट की शर्तों से तीन तरह के ऋणों को बाहर रखा गया है। इसमें बैंक के अपने कर्मचारियों को दिए गए ऋण, बैंकों के जमाकर्ता को उसकी जमा के एवज में दिए गए ऋण और गरीब तबकों को दिए जानेवाले डीआरआई (डिफरेंशियल रेट ऑफ इंटरेस्ट) अग्रिम शामिल हैं। यानी, किसानों वगैरह को बेस रेट से कम ब्याज पर भी कर्ज दिए जा सकते हैं। निर्यात ऋण से जुड़े नियम रिजर्व बैंक अलग से घोषित करेगा।

बैंक के बेस रेट जब भी कोई बदलाव किया जाएगा, वह नए-पुराने सभी ग्राहकों पर समान रूप से लागू होगा। बैंक अपने निदेशक बोर्ड या एसेट लायबिलिटी मैनेजमेंट कमिटी (एएलसीओ) के अनुमोदन से हर तिमाही में कम से कम एक बार अपने बैंक रेट की समीक्षा करेंगे। बैंकों को बेस रेट संबंधी सारी जानकारी अपनी सभी शाखाओं पर बेवसाइट पर देनी होगी। उन्हें हर तिमाही अपने ऋणों की वास्वतिक न्यूनतम व अधिकतम ब्याज दर की जानकारी रिजर्व बैंक को उपलब्ध करानी होगी। जानकारों का कहना है कि मौजूदा ग्राहकों के लिए बीपीएलआर तरीका जारी रखने और बेस रेट तय करने व छह महीने तक फॉर्मूला बदलते रहने की छूट देकर रिजर्व बैंक ने इस मसले पर बैंकों की आपत्तियों को शांत कर दिया है।

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