पिता भी पुत्र भी
कालरूपी परमात्मा ने ही इन सभी लोकों को धारण किया हुआ है। वह कालरूपी परमात्मा ही इन सभी लोकों में चारों ओर व्याप्त है। वही इन सब प्राणियों का पिता भी है और इन सबका पुत्र भी। संसार में उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं। ।।अथर्ववेद।।और भीऔर भी
भाषा नहीं, लोक से भी छल
।।राममनोहर लोहिया।। हिंदुस्तान की भाषाएं अभी गरीब हैं। इसलिए मौजूदा दुनिया में जो कुछ तरक्की हुई, विद्या की, ज्ञान की और दूसरी बातों की, उनको अगर हासिल करना है तब एक धनी भाषा का सहारा लेना पड़ेगा। अंग्रेज़ी एक धनी भाषा भी है और साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय भाषा भी। चाहे दुर्भाग्य से ही क्यों न हो, वह अंग्रेज़ी हमको मिल गई तो उसे क्यों छोड़ दें। ये विचार हमेशा अंग्रेज़ीवालों की तरफ से सुनने को मिलते हैं। इसमेंऔरऔर भी
घर में निर्वासित
आज़ादी के पहले और इतने सालों बाद भी जिन हिंदुस्तानियों ने अंग्रेज़ी को अपनाया, विकास और उन्नति का हर रास्ता उनके लिए खुल गया। बाकी लोग निर्वासित हैं। अपनी माटी को दुत्कारती यह कैसी व्यवस्था है जिसे हम ढोए चले जा रहे हैं?और भीऔर भी
तकरार का तुक!
मैं बड़ा कि तू? तू सही कि मैं? जब घनघोर समस्याएं हर तरफ से दबोचे हुए हों, तब ऐसी तकरार का क्या तुक! ऐसे में मुनासिब यही है कि सारे मतभेदों को भुलाकर समस्या से एक साथ जूझा जाए। अहं का मसला बाद में फिर कभी निपटा लेंगे।और भीऔर भी
नीयत है नाकाफी
किसी काम की सफलता के लिए अच्छी व सच्ची नीयत होना जरूरी तो है, पर्याप्त नहीं। अक्सर हम सच्ची नीयत के बावजूद एकदम नाकाम हो जाते हैं। कारण, जिस माध्यम पर काम कर रहे होते हैं, उसमें हो रहे बदलावों से हम आंखें मूंदे रहते हैं।और भीऔर भी
विवेक और स्मृति
विवेक तर्क की स्वाभाविक परिणति है, स्मृति विवेकयुक्त साधना और एकात्मता साधनायुक्त स्मृति की। तर्क विवेक तक ले जाता है। स्मृति अपने उत्स की ओर लौटना है। एकात्मता की अवस्था में तो जीने-मरने जैसे द्वैतभाव ही मिट जाते हैं।और भीऔर भी
नौ सालों में अर्थव्यवस्था की सबसे सुस्त चाल, प्रणबदा ने दी दिलासा
भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। उम्मीद थी कि बीते वित्त वर्ष 2011-12 की आखिरी तिमाही में अर्थव्यवस्था या जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की वृद्धि दर 6.1 फीसदी रहेगी। लेकिन केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की तरफ से गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक देश का जीडीपी जनवरी-मार्च 2012 के दौरान मात्र 5.3 फीसदी बढ़ा है। इसे मिलाकर पूरे वित्त वर्ष 2011-12 की आर्थिक विकास दर 6.5 फीसदी पर आ गई है, जबकि फरवरी में इसका अग्रिम अनुमानऔरऔर भी
बुद्धि की चर्बी
पढ़ा बहुत कुछ, पचाया कुछ नहीं तो बुद्धि पर चर्बी चढ़ जाती है। उसी तरह जैसे खाना अगर पूरा पचा नहीं तो शरीर पर चर्बी बनकर चढ़ता जाता है। इसलिए पढ़ें उतना ही, जितना पचा सकें। ध्यान दें, ज्यादातर बुद्धिजीवी अपच के शिकार होते हैं।और भीऔर भी
