सोना गिर रहा है। तीस दिनों में 13%, छह महीने में 19% और एक साल में 15% गिरा है। लेकिन पांच साल पहले से अब भी 75% ऊपर है। 2008 में सोना 800 डॉलर प्रति औंस था। अभी 1400 डॉलर के आसपास है। 2011 में हासिल 1800 डॉलर के शिखर से 22% नीचे। सोना क्यों चढ़ा और क्यों गिरा? इस पर मगजमारी करने के बजाय क्यों न सोने के कारोबार में लगी कंपनी पर दांव लगा दियाऔरऔर भी

लंबे दौर में अच्छे-बुरे का लॉजिक जरूर चलता होगा, लेकिन छोटे समय में शेयर बाज़ार में केवल एक लॉजिक चलता है। वो यह कि डिमांड ज्यादा है कि सप्लाई। इसी के जुड़ा है कि लालच ज्यादा है कि डर। अगर डिमांड या लालच का पलड़ा भारी है तो शेयर के भाव बढ़ेंगे। अगर डर के चलते लोग निकल रहे हैं और सप्लाई ज्यादा है तो शेयर के भाव गिरेंगे। समझदार ट्रेडर इसी नापतौल के बाद दांव चलतेऔरऔर भी

इंसान की फितरत है कि वो हमेशा सही होना चाहता है। गलत होने से घनघोर घृणा करता है। लेकिन यह फितरत ट्रेडिंग और निवेश की दुनिया में नहीं चलती। यहां का अकाट्य सत्य है कि नुकसान हर किसी को उठाना पड़ेगा। चार ही बातें हो सकती हैं: बड़ा लाभ, छोटा लाभ, बड़ा नुकसान, छोटा नुकसान। इसमें हमें बस बड़े नुकसान से बचने का तरीका खोजना है। बाकी तो वक्त का फेरा है। उतरते हैं आज के मैदानऔरऔर भी

कुछ लोग फाइनेंस को जमकर गरियाते हैं। कहते हैं कि यह तो बैठे-ठाले दूसरों की जेब ढीली करने का धंधा है, जबकि है यह उद्यमियों की प्रतिभा व मेहनत से हासिल कमाई में हिस्सेदारी का ज़रिया। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग भी खुद को खोजने जैसी यात्रा है। जोखिम से नहीं डरते; कूदकर फलों को लपकने में मज़ा आता है; अध्ययन, अनुशासन व मेहनत का मन है तो कामयाब होंगे। कल की हिट टिप्स के बाद बात आजऔरऔर भी

लोकतंत्र में कोई भी नीति संबंधी मानक आमजन के लिए अप्रासंगिक नहीं होना चाहिए। अगर वो अप्रसांगिक है तो तय मानिए कि उस लोकतंत्र से लोगों को सायास बाहर रखा गया है। मुद्रास्फीति के कल आए आंकड़े ने यही साबित किया है। सरकार, वित्त मंत्री, उसके संत्री तक चहक रहे हैं कि मार्च में मुद्रास्फीति घटकर 6% से नीचे आ गई है। हम-आप पूछ रहे हैं कि अच्छा! घट गई? कब कैसे? शेयर बाज़ार ने ऐसा नहींऔरऔर भी