बहाएगी बारिस, पर पढ़ाई तो हो जाए

इस बार की बारिस में शेयर बाज़ार जिस ढलान पर फिसल रहा है, वो कहां जाकर थमेगी, कुछ नहीं कहा जा सकता। सारा दारोमदार विदेशी निवेशकों पर है। और, उनका रुख इससे तय होगा कि अमेरिका सिस्टम में डॉलर झोंकने का सिलसिला कब तक जारी रखता है। न तो विदेशी निवेशकों के रुख और न ही अमेरिका के केंद्रीय बैंक के फैसले पर हमारा कोई वश है। वश है तो इस बात पर कि पुराने ज़माने के बौद्ध भिक्षुओं और जैन साधुओं की तरह हम इस बारिस में अध्ययन-मनन का काम तेज़ कर दें।

आज नज़र डालते हैं ट्रेडिंग से जुड़े प्रमुख साधन टेक्निकल एनालिसिस में पढ़े जानेवाले चार्टों पर। इन चार्टों को किसी स्टॉक या बाज़ार का एक्स-रे भी कहते हैं। इनमें खास ज़ोर भावों पर रहता है कि वे कहां जा रहे हैं। कैंडलस्टिक, लाइन, बार, टिक साइज़, आकृतियां, वोल्यूम या दूसरा कोई भी चार्ट भावों की हलचल को दिखाता है। लेकिन एक्स-रे में जो जगह खाली छूट गई हैं, उसका क्या? उस पर कोई ध्यान नहीं देता। यह तो बस तमाम आकृतियों के पीछे का परदा, नेपथ्य बनकर रह जाता है।

लेकिन प्रोफेशनल ट्रेडरों के लिए चार्ट का यह खाली हिस्सा बहुत अहम होता है क्योंकि यह ऐसी बात बताता है जो तमाम लाइनें, संकेतक, बार और कैंडल मिलकर भी नहीं बता सकते। सबसे पहले यह सच हमें कायदे से समझ लेना चाहिए कि वित्तीय बाज़ार और किसी भी दूसरी खरीदी-बेची जानेवाली वस्तु के भाव मांग और सप्लाई के समान नियम से संचालित होते हैं। वहां चीज़ें का सौदा होता है, जबकि यहां विदेशी मुद्रा, कमोडिटी, स्टॉक्स या उनके डेरिविटिव फ्यूचर्स व ऑप्शंस वगैरह का।

हर शेयर या स्टॉक का एक खास अंतर्निहित मूल्य होता है जो संबंधित कंपनी के धंधे, लाभप्रदता, भावी कैश-फ्लो और उद्योग में प्रतिस्पर्धा की स्थिति से तय होता है। मूल्य से भिन्न उसका भाव होता है जो असल में बाज़ार में बोला जाता है। यह भाव इससे तय होता है कि लोग उसके लिए कितनी कीमत देना चाहते हैं। मान लीजिए कि चीज़ अच्छी है। लेकिन कोई उसे लेना ही नहीं चाहता तो उसका भाव धूल चाटने लगेगा। दो चीजें सबसे खास हैं। एक, किसी खास वक्त उस स्टॉक की सप्लाई कितनी है या दूसरे शब्दों में कितने लोग उसे बेचना चाहते हैं। और दो, उसकी मांग कितनी है या कितने लोग उसे खरीदने को बेताब हैं।

भावों की इस खींचतान में तीन स्थितियां आती हैं। पहली यह कि भाव नीचे गिरते-गिरते ऐसी स्थिति में आ जाता है, जब मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाए। इसका मतलब कि खरीदनेवालों में होड़ मच जाती है और तब स्टॉक या शेयर के भाव पलटकर ऊपर का रुख कर लेते हैं। दूसरी यह कि भाव उठते-उठते ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जब सप्लाई मांग से ज्यादा हो जाती है। बेचनेवालों में होड़ लग जाती है। इससे अंततः भाव नीचे का रुख कर लेते हैं।

तीसरी स्थिति तब बनती है कि जब मांग और सप्लाई में संतुलन बन जाता है। भाव के ऐसे स्तर पर न तो बेचनेवालों की कोई दिलचस्पी होती है और न ही खरीदनेवालों की। खरीदने या बेचने की होड़ ठंडी पड़ जाती है। इस दौरान सब शांत हो जाता है। चार्ट पर कोई हलचल नहीं दिखती। भाव मामूली ऊपर नीचे होते हैं। छोटी-छोटी कैंडलस्टिक बनने लगती हैं। लेकिन बाज़ार जैसे ही इस संतुलन से बाहर निकलता है और भाव वहां पहुंचते हैं, जहां सप्लाई मांग से या मांग सप्लाई से ज्यादा होती है, फौरन मारकाट मच जाती है। इसके बाद बाज़ार फिर से संतुलन पकड़ने की दिशा में बढ़ता है। असंतुलन से संतुलन, संतुलन से असंतुलन, यही इस सृष्टि, इस दुनिया के लगातार चलने, बदलते रहने का रहस्य है।

असली सवाल यह है कि कहां पर एंट्री मारकर न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदा कमाया जा सकता है? कैसे पकड़ा जाए कि घरेलू संस्थाओं, बैंकों या विदेशी निवेशकों (एफआईआई) की तरफ से मांग कब आनेवाली है। भावों का चार्ट तो उन्हें दिखाता है जो सौदे हो चुके होते हैं। उसकी लाइनें और आकृतियां कभी भी यह नहीं दिखातीं कि बैंक और संस्थाओं जैसे बड़े निवेशक आग क्या करनेवाले हैं। इसे दिखाता है चार्ट का नेपथ्य, उसकी पृष्ठभूमि, उस पर छूट गई खाली जगह। वहीं से पता चलता है कि कब, कहां और कितना असंतुलन सप्लाई और मांग के बीच पनप रहा है।

असंतुलन जितना बड़ा, छोटी अवधि के ट्रेडर और लंबे समय के निवेशक के लिए उतना ही कम रिस्क और उतना ही ज्यादा कमाने की संभावना। न्यूनतम रिस्क, अधिकतम रिटर्न का बिंदु वो होता है जहां से भाव नई दिशा में मुड़ते हैं। हमें दिशा को पक्के तौर पर भांपने के लिए इसे ठीक घुमाव के तुरंत बाद के बिंदु पर पकड़ना होता है। नोट कर लें कि किसी भी बाज़ार में टर्निंग प्वाइंट या मोड़ तभी आता है जब मांग और सप्लाई में अंसंतुलन होता है।

टेक्निकल एनालिसिस में आम तौर पर बाज़ार के मोड़ या खरीद-बिक्री के संतृप्त स्तर को बताने के लिए समर्थन और बाधा (support & resistance) का इस्तेमाल किया जाता है। उसके मुताबिक किसी चार्ट पर समर्थन और बाधा के स्तर वहां होते हैं जहां सबसे ज्यादा सक्रियता, बहुत सारे बार और कैंडल बन रहे होते हैं। वो हर मोड़ पर औसत वोल्यूम जैसी बातों को भी तव्जजो देती है। लेकिन क्या सबसे अच्छा मोड़ वाकई वो होता है जहां सबसे ज्यादा सक्रियता होती है?

थोड़ा-सा ज़ोर दिमाग पर लगाएंगे तो इसका उत्तर होगा – नहीं। सोचिए, जब मांग और सप्लाई में सबसे ज्यादा असंतुलन होगा तब क्या आप खुद बेचने या खरीदने की पहल करेंगे? तब भाव न तो खरीदनेवाले के माफिक होगा और न ही बेचनेवाले के। इसलिए टेक्निकल एनालिसिस की सोच के विपरीत मांग और सप्लाई में ज्यादा असंतुलन होने पर बहुत कम गतिविधि होती है। चार्ट पर कम कैंडल या बार दिखाई देते हैं। इस दौरान वोल्यूम भी बहुत कम रहता है।

यह वो बिंदु होता है जहां से कोई स्टॉक इस या उस दिशा में खटाक से जाता है। जिस तरह हवाई जहाज़ टेक-ऑफ से पहले एक ही जगह पर थोड़ी देर तक घूं-घूं करता रहता है, वैसा ही हाल यहां होता है। मांग के सप्लाई पर भारी पड़ने पर स्टॉक खटाक से ऊपर उठता है। फिर ऊपर पहुंचकर कुछ समय तक जमता होता है। आम तौर पर बाधा को छूते ही फौरन वो नीचे नहीं आता। सीमित दायरें टहलता है। असल में कुछ बेचनेवाले अब भी बचे होते हैं जो खास स्तर पर पहुंचने पर पहले छूटे मौके को पकड़ लेना चाहते हैं। जब बेचनेवाले खत्म हो जाते हैं यानी सप्लाई चुक जाती है, तब एकबारगी भाव फिर छलांग लगाता है।

किसी खास भाव पर स्टॉक कितना वक्त बिताता है, इससे उसमें मांग और सप्लाई के संतुलन की सही स्थिति का पता चलता है। जितना कम समय, उतना ही ज्यादा असंतुलन। जितनी कम सक्रियता, उतना ही ज्यादा अंसंतुलन और उतने ही तगड़े मोड़ की संभावना। कम वोल्यूम के दौरान बड़ा वोल्यूम आने की तैयारी में लगा होता है। एक जगह खड़ा दिख रहा प्लेन तब टेक-ऑफ की तैयारी में लगा होता है। हमें यह बात कहीं गहरे अपने जेहन में बैठा लेनी चाहिए।

थोड़ा बताया, ज्यादा समझना क्योंकि मेरा ज्ञान किताबी है, जबकि आप तो बाज़ार में सालोंसाल से खेलते आ रहे हैं। लेकिन सोचिए कि चार्ट पर तमाम कैंडल, बार, इंडीकेटर, हेड एंड शोल्जर, डोज़ी, हरामी, ट्राएंगल और न जाने क्या-क्या आकृतियां देखने के बावजूद हम से चूक क्यों हो जाती है? इसका जबाव नए-नए संकेतकों की पीछे पड़ने में नहीं, बल्कि इस हकीकत में है कि हम चार्ट को पढ़ते तो अच्छी तरह हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उन तथ्यों का विश्लेषण कैसे किया जाए। जो दिखता है, उसका भी और जो नहीं दिखता, उसका भी। इस हफ्ते के लिए इतना ही काफी है। अगले शनिवार को फिर कोई नया पहलू लेकर आपके सामने आ जाऊंगा। हां, गिरावट के दौरान बीते पांच दिन में हमारे सुझाए स्टॉक्स का क्या हश्र हुआ, इसकी समीक्षा करने की ज़िम्मेदारी आपकी है।

 

 

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