किसी शेयर का मूल्य कंपनी के भावी अनुमानित कैश फ्लो को आज तक डिस्काउंट कर के निकाला जाता है। कैश फ्लो कंपनी के अंदर की चीज़ है, जबकि डिस्काउंट दर बाहर की। डिस्काउंट दर के दो निर्धारक तत्व होते हैं सरकारी बांडों की अल्पकालिक ब्याज और निवेशकों में रिस्क से बचने की प्रवृत्ति। रिस्क की प्रवृत्ति पर फिर कभी। अभी यह जानें कि ब्याज बढ़ने पर शेयर का मूल्य घट जाता है। कैसे मिलेगा आज इसका सबूत…औरऔर भी

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय शेयर बाज़ार से रिटेल निवेशक गायब हैं और इस पर संस्थागत निवेशक हावी हैं। इन निवेशकों में भी 49% हिस्से के साथ एफआईआई सब पर भारी हैं। बीमा कंपनियों का हिस्सा इसमें करीब 20% है। कुछ जानकार बताते हैं कि आम चुनावों के नतीजों के बाद भारतीय शेयरों में लगा दो-तिहाई धन विदेशी निवेशकों का ही है। इस सच की रौशनी में बनाते हैं ट्रेड की रणनीति…औरऔर भी

समय और उसके साथ निरतंर विकास। जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह निवेश में भी इन्हीं दो पक्षों का ध्यान रखना पड़ता है। चाहने से चंद दिन में पौधा पेड़ नहीं बनता। यह भी सही है कि बोया पेड़ बबूत का तो आम कहां से होए। कंपनियां अच्छी चुनो। फिर देखो चक्रवृद्धि दर का कमाल। कंपनी के साथ आपका धन कुलांचे मारता बढ़ेगा। दीर्घकालिक निवेश की सेवा तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी, जिसे बढ़ना है आगे…औरऔर भी

ज्यादातर लोगों पर शेयरों की ट्रेडिंग का ऐसा जुनून सवार रहता है कि उन्हें अपने सिवाय कुछ नहीं दिखता। नहीं दिखता कि बाज़ार बनता ही है ठीक एक समय परस्पर विरोधी सोच के संयोग से। वर्तमान भाव पर दोनों की समान राय, लेकिन भावी मूल्य पर एकदम उलट। एक सोचता है बढ़ेगा तो खरीदता है। दूसरा सोचता है गिरेगा तो बेचता है। आत्ममोह के इस सम्मोहन से निकलना ज़रूरी है। अब पकड़ते हैं अगस्त का पहला ट्रेड…औरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशकों का खेल बड़ा व्यवस्थित होता है। कैश सेगमेंट में कोई स्टॉक खरीदा तो डेरिवेटिव सेगमेंट में उसके अनुरूप फ्यूचर्स बेच डाले। दोनों के भाव में 10% सालाना का अंतर हुआ तो वे मजे में आर्बिट्राज करते हैं। उनका लक्ष्य है रुपए डॉलर की विनिमय दर के असर के बाद कम से कम 6-8% कमाकर वापस ले जाना। टैक्स उन्हें देना नहीं होता। जेटली ने कृपा और बढ़ा दी। उनसे सीखते हुए अभ्यास आज का…औरऔर भी