निवेश का मूल-मंत्र है: जब सभी प्रफुल्लित हों तो बेचकर निकल लो और दुखी हों तो एंट्री ले लो। मजबूत से मजबूत कंपनी का शेयर पिछले साल अगस्त में न्यूनतम स्तर पर था क्योंकि तब चालू खाते और रुपए पर कोहराम मचा था। जिसने तब एंट्री ली, आज 40-140% कमा चुका होगा। सितंबर में हमने कमिन्स इंडिया को 400 के आसपास चुना। अभी 705 तक जाने के बाद 660 पर है। उसे बेचकर तथास्तु में बढ़िए आगे…औरऔर भी

अमेरिकी बाज़ार भयंकर रिस्क के मुहाने पर खड़ा है। यह रिस्क फटा तो भारत समेत दुनिया भर के बाज़ार टूट सकते हैं। वैश्विक विश्लेषक डग शॉर्ट के अध्ययन के मुताबिक अमेरिकी शेयर सूचकांक को मुद्रास्फीति से समायोजित कर 140 सालों की ट्रेंड लाइन खीचें तो बाज़ार अभी उस रेखा से करीब 86% ऊपर है। 1929 की महामंदी से ठीक पहले यह 81% ऊपर था। ऐसे में सीखनी होगी अफरातफरी में कमाने की कला। अब शुक्र का वार…औरऔर भी

लंबे समय में शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स से तय होते हैं। लेकिन छोटे समय में न तो ये बदलते हैं और न ही इनकी खास अहमियत होती है। छोटे समय में सबसे ज्यादा अहम है जोखिम से बचने या रिस्क अवर्जन की मनःस्थिति। इसे नापने का बाकायदा गणितीय फॉर्मूला है। ट्रेडिंग के कुछ मॉडल इसी आधार पर भावी भाव का अनुमान लगाते हैं। मूल बात है संभावनाओं को समझना। अब करते हैं गुरुवार का प्रस्थान…औरऔर भी

ब्याज दर जस-की-तस तो बाज़ार बढ़ा सहज गति से। छोटी अवधि में शेयरों के भाव जिस दूसरी बात से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं वो है निवेशकों की रिस्क उठाने की मानसिकता। अगर वे रिस्क लेने से डरते हैं तो भाव गिरते हैं और बगैर खास परवाह किए रिस्क उठाते हैं तो भाव चढ़ते हैं। ट्रेडिंग में अक्सर कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, दांव लगाने की मानसिकता का वास्ता होता है शेयरों के बढ़ने से। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी