गांव-देहात से लेकर शहर के तमाम लोग अब पढ़-लिखकर नौकरी का इंतज़ार करने की निरर्थकता समझने लगे हैं। उन्हें लगता है कि इससे तो बिजनेस करना ही ठीक है। पर बिजनेस में ज्यादातर लोगों की सोच व्यापार या दलाली से ऊपर नहीं जाती। जिनकी सोच इससे ऊपर जाती है उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं होती। ऐसे ही लोगों को बिजनेस में उतरने का मौका देता है बनी-बनाई कंपनियों के शेयरों में निवेश। आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

जमकर रिसर्च की। ट्रेडिंग के लिए स्टॉक चुना। सौदा किया, घाटा लगा। फिर सारा ज्ञान-ध्यान लगाया। लेकिन ट्रेड किया, फिर घाटा। ऐसा लगातार तीन-चार बार हो जाए तो मन में बैठ जाता है कि कहीं हमसे भारी चूक हो रही है या म्हारी किस्मत ही खोटी है। लेकिन लगातार घाटा सफलतम ट्रेडर भी खाते हैं। फर्क इतना है कि वे बाज़ार का मनमानापन मानते हैं; दिल नहीं डुबाते; औसत कमाई पर लगाते ध्यान। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कल बाज़ार बंद होने के बाद खबर आई कि औद्योगिक उत्पादन जून में घट गया, रिटेल मुद्रास्फीति जुलाई में बढ़ गई। शेयरों के भाव ऐसी खबरों से कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय जगत और कंपनियों की हलचलों से प्रभावित होते हैं। लालच होता है कि हम भी खबरों पर ट्रेडिंग करें तो जमकर कमा लें। लेकिन यह मृग-मरीचिका है। खबरें पहुंचती हैं हमसे कहीं पहले, ऑपरेटरों तक। हमारे लिए तो चार्ट ही सहारा हैं। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग तो हर कोई पैसे बनाने के लिए करता है। लेकिन कुछ लोगों का ज्यादा ध्यान इस बात रहता है कि बाज़ार की चालढाल को अच्छी तरह समझकर बेहतर ट्रेडर कैसे बना जाए। वे दूसरों से मिली हर टिप या जानकारी को खुद परखते हैं और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करते हैं। घाटा खाने पर सिर नहीं धुनते, बल्कि इसकी वजह समझकर कमियां दूर करते हैं। अब बढ़ते हैं मंगलवार की ट्रेडिंग की ओर…औरऔर भी