लंबे समय में शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स से तय होते हैं। लेकिन छोटे समय में न तो ये बदलते हैं और न ही इनकी खास अहमियत होती है। छोटे समय में सबसे ज्यादा अहम है जोखिम से बचने या रिस्क अवर्जन की मनःस्थिति। इसे नापने का बाकायदा गणितीय फॉर्मूला है। ट्रेडिंग के कुछ मॉडल इसी आधार पर भावी भाव का अनुमान लगाते हैं। मूल बात है संभावनाओं को समझना। अब करते हैं गुरुवार का प्रस्थान…औरऔर भी

ब्याज दर जस-की-तस तो बाज़ार बढ़ा सहज गति से। छोटी अवधि में शेयरों के भाव जिस दूसरी बात से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं वो है निवेशकों की रिस्क उठाने की मानसिकता। अगर वे रिस्क लेने से डरते हैं तो भाव गिरते हैं और बगैर खास परवाह किए रिस्क उठाते हैं तो भाव चढ़ते हैं। ट्रेडिंग में अक्सर कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, दांव लगाने की मानसिकता का वास्ता होता है शेयरों के बढ़ने से। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

किसी शेयर का मूल्य कंपनी के भावी अनुमानित कैश फ्लो को आज तक डिस्काउंट कर के निकाला जाता है। कैश फ्लो कंपनी के अंदर की चीज़ है, जबकि डिस्काउंट दर बाहर की। डिस्काउंट दर के दो निर्धारक तत्व होते हैं सरकारी बांडों की अल्पकालिक ब्याज और निवेशकों में रिस्क से बचने की प्रवृत्ति। रिस्क की प्रवृत्ति पर फिर कभी। अभी यह जानें कि ब्याज बढ़ने पर शेयर का मूल्य घट जाता है। कैसे मिलेगा आज इसका सबूत…औरऔर भी

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय शेयर बाज़ार से रिटेल निवेशक गायब हैं और इस पर संस्थागत निवेशक हावी हैं। इन निवेशकों में भी 49% हिस्से के साथ एफआईआई सब पर भारी हैं। बीमा कंपनियों का हिस्सा इसमें करीब 20% है। कुछ जानकार बताते हैं कि आम चुनावों के नतीजों के बाद भारतीय शेयरों में लगा दो-तिहाई धन विदेशी निवेशकों का ही है। इस सच की रौशनी में बनाते हैं ट्रेड की रणनीति…औरऔर भी

समय और उसके साथ निरतंर विकास। जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह निवेश में भी इन्हीं दो पक्षों का ध्यान रखना पड़ता है। चाहने से चंद दिन में पौधा पेड़ नहीं बनता। यह भी सही है कि बोया पेड़ बबूत का तो आम कहां से होए। कंपनियां अच्छी चुनो। फिर देखो चक्रवृद्धि दर का कमाल। कंपनी के साथ आपका धन कुलांचे मारता बढ़ेगा। दीर्घकालिक निवेश की सेवा तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी, जिसे बढ़ना है आगे…औरऔर भी