उद्यमी खेलें रिस्क से, ट्रेडर हिसाब से
आजकल लोगों को नौकरी कम जमती है। स्टार्ट-अप बन चुके हैं और बनते ही जा रहे हैं। उद्यमियों की भी भरमार है। सभी आर्थिक आज़ादी चाहते हैं। वित्तीय बाज़ार में भी लोगबाग यही आज़ादी हासिल करने के लिए आते हैं। सभी रिस्क लेते हैं। लेकिन स्टार्ट-अप, उद्यमी, निवेशक या ट्रेडर के रिस्क लेने का स्तर भिन्न होता है। उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है, जबकि ट्रेडर हिसाब से रिस्क लेता है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी
खेती बढ़ी तो अर्थव्यवस्था चमाचम
भारतीय अर्थव्यवस्था में अगले बीस सालों तक ठहराव या मंदी आने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि 125 करोड़ की आबादी में से अभी तक 100 करोड़ का बाज़ार तो खुला ही नहीं है। हमारा जीडीपी इस साल मरी-गिरी हालत में भी 7.4% बढ़ना चाहिए। वो भी तब, जब कृषि की विकास दर शायद 0.1% भी न रहे। सोचिए, कृषि अगर 4% सालाना बढ़ने लगे तो जीडीपी कहां पहुंच जाएगा! आज कृषि से जुड़ी एक जानदार कंपनी…औरऔर भी
प्रायिकता के बाज़ार में सोच अतिवादी
हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
घातक है सही होने का अति-विश्वास
हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी






