हमारे वित्तीय बाजार में अंग्रेज़ी तो शिकारियों की भाषा बन गई है जो भारी-भरकम, रटे-रटाए शब्द या जुमले फेंककर आम लोगों की कमाई साफ करते हैं। लेकिन हिंदी में भी ऐसे ‘सलाहकारों’ की कमी नहीं है जो बराबर कहते फिरते हैं कि महीनों पहले उन्होंने जहां कहा था, निफ्टी आज वहीं चल रहा है। बार-बार फेंटते रहते हैं कि बाज़ार उनके इशारे पर नाचता है। लेकिन गुरुजी! आप खुद क्यों नहीं कमा लेते? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पता हो कि आगे क्या होनेवाला है, पूरा बाज़ार किधर जाएगा या कोई शेयर कहां तक गिरने के बाद पलट सकता है और जैसा पता था, हकीकत में वैसा ही हो जाए, तब भी बाज़ार में घाटा खानेवाले 95% ट्रेडर मुनाफा नहीं कमा सकते। इसका प्रमाण यहीं अर्थकाम के कॉलम से पाया जा सकता है। स्टॉक भीतर, लेकिन बाहर दाएं छोर पर निफ्टी की दशा-दिशा अक्सर सटीक बैठती है। लेकिन कमाया कितनों ने! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कभी ध्यान से सोचिए, मनन कीजिए कि शेयर बाजार के 95% ट्रेडर घाटा क्यों खाते हैं। इसकी वजह यह नहीं कि वे बाज़ार की चाल नहीं भांप पाते, बल्कि यह है कि उन्हें जीत-हार का संतुलन बनाना नहीं आता, घाटे को कम से कम रखना और मुनाफे को अधिक से अधिक ले जाना नहीं आता। आसान शब्दों में कहा जाए तो उन्हें जीत को संभालना और हार को पचाना नहीं आता। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में जितने भी लोगों की दिलचस्पी है, वे अक्सर मिलते ही पूछते हैं कि बाज़ार यहां से कहां जाएगा। फिर खुद ही बोल पड़ते हैं कि मुझे तो लगता है निफ्टी 8200 के पार नहीं जा पाएगा क्योंकि वहां तगड़ा रेजिस्टेंस है। हर कोई एक्सपर्ट। लगता है कि बाज़ार की लगाम और भविष्य उनके ही हाथ में है। इसी सोच का नतीजा है कि बाजार में 95% ट्रेडर घाटा खाते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

इंसानों का काम मशीनें करने लगें तो लोग क्या करेंगे? हाल की खबर है कि विप्रो 3000 सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का काम कृत्रिम इंटेलिजेंस से करवाने जा रही है। इसी 5 जून को स्विटज़रलैंड के 76.9% लोगों ने हर देशवासी को सम्मान सहित जीवन जीने के लिए बुनियादी आय देने का प्रस्ताव खारिज़ कर दिया। मगर, जब तक लोगों की ज़रूरतें रहेंगी, उत्पादन इंसान करे या मशीनें, कंपनियां तो बनी ही रहेंगी। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी