सामान्य बाज़ार में लोगबाग खरीदने के लिए दाम गिरने का इंतज़ार करते हैं, जबकि वित्तीय बाज़ार में खरीदने से पहले अच्छी खबरों और भावों के चढ़ने का इंतज़ार करते हैं। हां, सिद्धांत में बराबर दोहराते हैं कि वित्तीय बाजार से कमाई के लिए निचले स्तर पर खरीदना और ऊंचे स्तर बेचना चाहिए। वित्तीय सलाहकार और विश्लेषक भी यही भाषण पिलाते हैं। अहम सवाल है कि इस सिद्धांत को व्यवहार में कैसे उतारा जाए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

विचित्र विरोधाभास है कि सामान्य बाज़ार में लोगों का रुख वित्तीय बाज़ार से एकदम उलट रहता है। वे ज्यादातर चीजें सेल या डिस्काउंट पर खरीदना पसंद करते हैं, जबकि वित्तीय बाज़ार में चढ़ते शेयरों को खरीदना और गिरते शेयरों को बेचना चाहते हैं। यह शेयर बाज़ार को हौवा समझने से उपजी हीनता ग्रंथि का नतीजा है। सच यह है कि शेयर बाज़ार सामान्य बाज़ार की ही तरह डिमांड-सप्लाई के नियम पर चलता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

इधर पिछले कुछ महीनों से शेयर बाज़ार में सक्रिय निवेशकों व ट्रेडरों की संख्या बढ़ती जा रही है। दरअसल जब भी बाज़ार बढ़ता है, शेयरों के भाव नई ऊंचाई बनाते हैं, तब ज्यादातर लोगों को शेयर खरीदने में बड़ी सुरक्षा महसूस होती है। वहीं, भावों के गिरने पर वे किसी भी कीमत पर बेचकर निकल लेने की फिराक में रहते हैं। यह मानसिकता दीर्घकालिक निवेश व अल्पकालिक ट्रेडिंग, दोनों के लिए घातक है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

स्वाभाविक व सहज सोच वित्तीय बाज़ार से कमाने के मामले में हमारे किसी काम की नहीं। यह सोच हमें कमज़ोरी से बचाने और सुरक्षा के लिए समूह के साथ चलते को उकसाती है। दिक्कत यह है कि वित्तीय बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और 5% ट्रेडर ही कमाते हैं। यहां समूह समझदारी नहीं दिखाता, बल्कि भेड़ों के झुंड की तरह बर्ताव करता है। गड़ेरिये या उस्ताद लोग इन भेड़ों से मुनाफा बटोरते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

निवेश करना, कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, टाइप चीज़ नहीं है। न ही जोश का निवेश फलदायी होता है। शेयर बाज़ार में निवेश करते वक्त आप ऐसी कंपनी पर दांव लगा रहे होते हैं जिसका प्रबंधन आप से स्वतंत्र है। इसलिए दो बातों को समझना ज़रूरी है। एक, उसका बिजनेस मॉडल कितना चौकस है। दो, निवेश तभी करें जब शेयर का भाव पर्याप्त सुरक्षा मार्जिन दे रहा हो। अब तथास्तु में आज की संभावनामय कंपनी…औरऔर भी