मानते हैं कि जो चढ़ा है, वह गिरेगा ज़रूर। लेकिन शेयर बाजार में यह धारणा पूरी तरह लागू नहीं होती। मजबूत कंपनियों के शेयर चढ़े तो चढ़ते चले जाते हैं, जब तक उनमें कोई बहुत खराब खबर नहीं आती। कमज़ोर कंपनियों के शेयर भी सटोरियो के हाथ से चढ़े तो गिरने में बहुत वक्त लगाते हैं। वहीं, कमज़ोर कंपनियों के शेयर गिरे तो गिरते चले जाते हैं। गिरा उठता नहीं, बढ़ा गिरता नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार का हाल इस समय निराला है। हर दिन औसतन 150-200 कंपनियों के शेयर 52 हफ्ते का नया उच्चतम स्तर बना रही है तो मात्र 5-10 न्यूनतम स्तर। मसलन, शुक्रवार को एनएसई में 146 शेयरों ने नया शिखर बनाया तो केवल चार ने तलहटी पकड़ी, वो भी बेहद झंडू-झाप स्क्रिप्स ने। ऐसे में बड़ी मुश्किल है कि कौन-से शेयर पकड़े जाएं जिनमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश अभी बाकी हो। फिलहाल देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार या किसी भी वित्तीय बाज़ार में निवेश तभी करना चाहिए जब आप जितना लगा रहे हैं, उसे डुबाने के तैयार हों। कहने का यह बड़ा औघड़ अंदाज़ है। लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि यह बाज़ार इतना रिस्की है कि आप जितना धन लगाते हैं, वह सारा का सारा डूब सकता है। इसलिए इसमें वही धन लगाएं जिसके डूबने पर आपके ठाट-बाट और सेहत पर कोई फर्क न पड़े। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थाओं व एलआईसी से ज्यादा निवेश म्यूचुअल फंडों ने कर रखा है। म्यूचुअल फंडों में ज्यादातर रिटेल निवेशक ही नामा लगाते हैं। यह भी सच है कि वे जितनी तेज़ी से बाज़ार में घुसते हैं, उतनी ही तेज़ी से बाहर भी निकलते हैं। ज़रा-सी विपरीत हलचल उनमें घबराहट का तूफान पैदा कर देती है। विदेशी संस्थाएं तो ऋण-प्रपत्रों में सुरक्षित हैं। तब अकेली एलआईसी बाज़ार को कैसे बचा पाएगी? अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कमोबेश सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2018 में शेयर बाज़ार पिछले कुछ सालों जितना तेज़ नहीं रहने जा रहा। एक वजह तो यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब शेयरों से ज्यादा सरकारी या कॉरपोरेट ऋण को अहमियत देने लगे हैं। दूसरी वजह है कि मार्च से राज्यों के चुनावों का जो सिलसिला शुरू हो रहा है, वह राजनीतिक उहापोह पैदा कर सकता है। तीसरे, मोदी सरकार कठोर आर्थिक फैसलों से बचेगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी