यूं तो शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में वोल्यूम का बहुत ज्यादा महत्व नहीं होता। वैसे भी इसके आंकड़े इतना गड्डम-गड्ड होते हैं कि इससे कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती। इसलिए इसके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन इसका भान ज़रूर होना चाहिए कि बाज़ार में इतने करोड़ों का कारोबार कौन लोग खड़ा करते हैं। आम निवेशकों या ट्रेडरों की स्थिति सागर तो नहीं, लेकिन तालाब में एक मग पानी से ज्यादा नहीं होती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बीएसई व एनएसई के कैश सेगमेंट में हर दिन औसतन 32,000 करोड़ रुपए का कारोबार। डेरिवेटिव सेगमेंट में यह आंकड़ा 4 लाख करोड़ रुपए तक चला जाता है। शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 3.88 करोड़ हो चुकी है। लेकिन बराबर सक्रिय निवेशकों या ट्रेडरों की संख्या दो लाख से ज्यादा नहीं होगी। देशी व विदेशी संस्थाएं 10-12 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा का धंधा नहीं करतीं। कौन हैं बाकी खिलाड़ी! अब सोम का व्योम…और भीऔर भी

सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की कीमत सरकारी कंपनियों को चुकानी पड़ती है। वरना, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं कि निजी कंपनियां प्रबंधन के लिहाज़ से बेहतर होती हैं। बल्कि, सरकारी कंपनियां ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से चलाई जा सकती हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें सरकार को रहना ही चाहिए। कुछ और भी क्षेत्र हैं जहां सरकार की अहम भूमिका है और आगे भी बनी रहेगी। तथास्तु में आज ऐसे ही एक क्षेत्र की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना है तो हमें समग्र अर्थशास्त्र के बजाय इंसान के धन-संबंधी मनोविज्ञान को कायदे से समझना पड़ेगा। तभी हम अपने पूर्वाग्रहों के निजात पा सकते हैं। इनमें सबसे अहम पूर्वाग्रह है कि हम फायदे पर जितना चहकते हैं, उतनी ही रकम के नुकसान पर दोगुना दुखी हो जाते हैं। इस सोच के चलते घाटा लगने पर भी किसी सौदे को छोड़ नहीं पाते और घाटा बढ़ाते जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया हमारे मन से नहीं, अपने नियम-धर्म से चलती है। धन से जुड़े वित्तीय बाज़ार का हाल तो एकदम निराला है। व्यक्तियों का मनोविज्ञान जब एक साथ मिलकर समूह का मनोविज्ञान बनता है तो उसका रूप-रंग एकदम बदल जाता है। लेकिन हम मन में जमे अपने पूर्वाग्रहों से इस कदर चिपके रहते हैं कि सामूहिक मनोवैज्ञानिक को समझ नहीं पाते। ट्रेडिंग से कमाने में हमारा यह सहज ‘संस्कार’ बड़ा घातक साबित होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी