शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में बहुत सारा ज्ञान काम नहीं आता। मशहूर किस्सा है कि साल 1720 में न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक ने पहले तो साउथ-सी कंपनी के शेयर बेचकर 7000 डॉलर कमाए। लेकिन उसके कुछ महीने बाद ही चढ़े बाज़ार में 20,000 डॉलर गवां डाले। सोचिए, जिसने तीन अकाट्य नियम दिए, जो ग्रहों की गति की सटीक गणना कर लेता था, वही वैज्ञानिक बाज़ार के मन की सटीक गणना नहीं कर पाया। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जीवन में हम इसलिए नहीं मात खाते कि हम कम जानकार या बुद्धिमान हैं, बल्कि ज्यादातर मात हम इसलिए खाते हैं क्योंकि जो जैसा है, उसे वैसा उसी रूप में, यथाभूत नहीं देख पाते। हम मन पहले बनाते हैं। फिर दूसरों की बात-सलाह और आंकड़ों से उसकी पुष्टि करते हैं। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में हम मन के आईने से सच देखते हैं, जबकि असली सच दूर खड़ा हमें चिढ़ाता रहता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

कंपनियां यूं ही अचानक नहीं डूब जातीं। उनके डूबने का एक अहम कारण है ऋण। कंपनी ऋण के भारी बोझ से दबी है और उसका परिचालन लाभ तय देय ब्याज के दो-तीन गुना से ज्यादा नहीं है तो वह डूब सकती है। इसलिए हमें कभी भी एक गुने से ज्यादा ऋण-इक्विटी अनुपात वाली कंपनी में निवेश नहीं करना चाहिए। साथ ही उसका धंधा अगले 15-20 सालों तक प्रासंगिक बने रहना चाहिए। अब तथास्तु में एक शानदार कंपनी…औरऔर भी