मन को नकारात्मक व नुकसानदेह मान्यताओं या धारणाओं के मुक्त करने के एक नहीं, अनेक तरीके हैं। मूल बात है कि इन्हें हमें अपने अंदर देखना होगा। इन्हें देखना भर है। न इनसे जुड़ाव रखना है, न दुराव। इतना करते ही इनका मिटना शुरू हो जाएगा। एक दिन चेतन और अवचेतन मन के बीच की लौह दीवार टूट जाएगी और मन पूरी ताकत से खिल उठेगा। लेकिन यह काम आपको खुद करना होगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

धीरे-धीरे पुरानी मान्यताएं पीछे हटती जाती हैं और उनकी जगह ट्रेडिंग का वस्तुपरक नज़रिया लेने लगता है। हमें कभी-कभी आंखें बंदकर इस नए नज़रिए को आकार लेते महसूस करना चाहिए। पुराने के जाने और नए के आने को अनुभूति पर कसना चाहिए। इस तरह हम अपने अवचेतन मन को ट्रेन करते जाते हैं। याद रखें कि अवचेतन मन हमारी 95% क्रियाओं व सोच को कंट्रोल करता है, जबकि चेतन मन मात्र 5% को। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अपनी ही मान्यताओं को दृष्टा भाव से देखने पर धीरे-धीरे हमारे अंदर ‘जो जैसा है, उसे वैसा ही’ देखने की दृष्टि विकसित होने लगती है। यही वह मुकाम है जहां पहुंचते ही आपको ट्रेडिंग के नियम लिखकर रख लेने चाहिए, चाहे वह स्टॉक के चयन से जुड़ा हो, स्टॉप-लॉस या पोजिशन साइज़िंग से जुड़ा हो या टेक्निकल एनालिसिस के कुछ सकेतकों का पालन करना हो। मान्यताओं को सिर उठाते ही नियमों पर कसें। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आखिर मन में जमी मान्यताओं को कैसे काटा जाए? दरअसल, वे कंप्यूटर ग्लिच की तरह हैं। वे कंप्यूटर कोड की तरह हमारे ट्रेड ही नहीं, जीवन तक को प्रभावित करती हैं। इसलिए उन्हें हमें निष्क्रिय करना पड़ेगा, अन-इंस्टॉल करना पड़ेगा। इस काम की शुरुआत तभी हो सकती है जब हम शांत मन से उन मान्यताओं को देखना शुरू कर दें। जैसे ही उनका शिकंजा कसे, हम उन्हें दृष्टा भाव से देखने लग जाएं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

घर-परिवार व समाज से मिली मान्यताएं ट्रेडरों की सोच से लेकर कर्म तक को बांध देती हैं। वे न मुक्त रूप से विश्लेषण कर पाते हैं और न ही सही तस्वीर देख पाते हैं। खुद को नुकसान पहुंचाने के कदम उठाते हैं। वे इससे निकलने के लिए किताबें बढ़ते हैं, अभ्यास करते है, खुद से बार-बार वादा करते हैं कि आगे से गलती नहीं करेंगे। लेकिन पुरानी मान्यताएं उन्हें पटकती रहती है। अब सोम का व्योम…और भीऔर भी