जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना होगा
जीवन में हम इसलिए नहीं मात खाते कि हम कम जानकार या बुद्धिमान हैं, बल्कि ज्यादातर मात हम इसलिए खाते हैं क्योंकि जो जैसा है, उसे वैसा उसी रूप में, यथाभूत नहीं देख पाते। हम मन पहले बनाते हैं। फिर दूसरों की बात-सलाह और आंकड़ों से उसकी पुष्टि करते हैं। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में हम मन के आईने से सच देखते हैं, जबकि असली सच दूर खड़ा हमें चिढ़ाता रहता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी
ऋण से दबी कंपनी तो करें तौबा
कंपनियां यूं ही अचानक नहीं डूब जातीं। उनके डूबने का एक अहम कारण है ऋण। कंपनी ऋण के भारी बोझ से दबी है और उसका परिचालन लाभ तय देय ब्याज के दो-तीन गुना से ज्यादा नहीं है तो वह डूब सकती है। इसलिए हमें कभी भी एक गुने से ज्यादा ऋण-इक्विटी अनुपात वाली कंपनी में निवेश नहीं करना चाहिए। साथ ही उसका धंधा अगले 15-20 सालों तक प्रासंगिक बने रहना चाहिए। अब तथास्तु में एक शानदार कंपनी…औरऔर भी
डेरिवेटिव सेगमेंट में सटोरिये हैं हावी
क्या डेरिवेटिव सौदों में हाथ डालना आम निवेशकों के लिए वाजिब है? असल में निफ्टी ऑप्शंस अपने-आप में बहुत लुभावना ट्रैप है। निफ्टी के कॉल या पुट सौदों में ज्यादा धन लगता नहीं और जनरल इंश्योरेंस की तरह जितना लगता है, ज्यादा से ज्यादा उतना ही डूबता है तो लोग छपाक से कूद पड़ते हैं। लेकिन इस सेगमेंट में 3/4 से ज्यादा सटोरिया ऑपरेटर सक्रिय हैं। एफआईआई या डीआईआई 1/4 तक सिमटे हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी








