हर सरकारी कंपनी वाहियात नहीं!
सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की कीमत सरकारी कंपनियों को चुकानी पड़ती है। वरना, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं कि निजी कंपनियां प्रबंधन के लिहाज़ से बेहतर होती हैं। बल्कि, सरकारी कंपनियां ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से चलाई जा सकती हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें सरकार को रहना ही चाहिए। कुछ और भी क्षेत्र हैं जहां सरकार की अहम भूमिका है और आगे भी बनी रहेगी। तथास्तु में आज ऐसे ही एक क्षेत्र की कंपनी…औरऔर भी
घाटे से घबराना धकेल देता दलदल में
शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना है तो हमें समग्र अर्थशास्त्र के बजाय इंसान के धन-संबंधी मनोविज्ञान को कायदे से समझना पड़ेगा। तभी हम अपने पूर्वाग्रहों के निजात पा सकते हैं। इनमें सबसे अहम पूर्वाग्रह है कि हम फायदे पर जितना चहकते हैं, उतनी ही रकम के नुकसान पर दोगुना दुखी हो जाते हैं। इस सोच के चलते घाटा लगने पर भी किसी सौदे को छोड़ नहीं पाते और घाटा बढ़ाते जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
ट्रेडिंग के लिए दूर करें तमाम पूर्वाग्रह
दुनिया हमारे मन से नहीं, अपने नियम-धर्म से चलती है। धन से जुड़े वित्तीय बाज़ार का हाल तो एकदम निराला है। व्यक्तियों का मनोविज्ञान जब एक साथ मिलकर समूह का मनोविज्ञान बनता है तो उसका रूप-रंग एकदम बदल जाता है। लेकिन हम मन में जमे अपने पूर्वाग्रहों से इस कदर चिपके रहते हैं कि सामूहिक मनोवैज्ञानिक को समझ नहीं पाते। ट्रेडिंग से कमाने में हमारा यह सहज ‘संस्कार’ बड़ा घातक साबित होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी
बाज़ार का मन समझना आसान नहीं
शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में बहुत सारा ज्ञान काम नहीं आता। मशहूर किस्सा है कि साल 1720 में न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक ने पहले तो साउथ-सी कंपनी के शेयर बेचकर 7000 डॉलर कमाए। लेकिन उसके कुछ महीने बाद ही चढ़े बाज़ार में 20,000 डॉलर गवां डाले। सोचिए, जिसने तीन अकाट्य नियम दिए, जो ग्रहों की गति की सटीक गणना कर लेता था, वही वैज्ञानिक बाज़ार के मन की सटीक गणना नहीं कर पाया। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी






