जून तिमाही में जीडीपी 8.2% बढ़ गया। कंपनियों के नतीजे भी बेहतर आने लगे। पर देशी व विदेशी संस्थाओं की खींचतान, एलआईसी पर बढ़े बोझ, आईएल एंड एफएस के संकट, राजनीतिक दुविधा, कमज़ोर रुपए, महंगे कच्चे तेल और बढ़ती ब्याज दरों ने सब पटरा कर दिया। बाज़ार गिर गया। फिर भी सेंसेक्स 22.33 और निफ्टी 25.30 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है तो गिरने के बाद भी अभी महंगा है बाज़ार। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

ग्लोबल बनी दुनिया का दुष्प्रभाव है कि अमेरिका और चीन के व्यापार-युद्ध का प्रभाव भारत समेत सभी देशों पर पड़ता है। यह हमारे शेयर बाज़ार पर लगी साढ़े-साती का एक प्रमुख तत्व है। इस साल मार्च से ट्रम्प ने इसका बिगुल बजाया और अब दोनों देश एक दूसरे के उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने में लगे हुए हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका शुल्क बढ़ाना ज्यादा ही मारक होता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाज़ार से निवेश निकाल भागते जा रहे हैं। इससे भारतीय रुपया कमज़ोर पड़ता गया और डॉलर 75 रुपए के करीब जा पहुंचा। उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। भारत अपनी ज़रूरत का 83% कच्चा तेल आयात करता है तो उसे खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ती गई जिससे रुपया और ज्यादा कमज़ोर होता जा रहा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने भले ही शुक्रवार को रेपो व रिवर्स रेपो दर को 6.50% और 6.25% पर अपरिवर्तित रखा। लेकिन भारत से लेकर अमेरिका तक में ब्याज दरें बढ़ रही हैं। अपने यहां सरकारी बांडों पर यील्ड की दर 8-8.5% चल रही है, जबकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अभी हाल में पिछले तीन सालों में आठवी बार ब्याज दर बढ़ाकर 2-2.25% कर दी और आगे चार बार फिर बढ़ाने का संकेत दे दिया। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

महीने भर से गिर रहा शेयर बाज़ार कितना और गिरेगा, कहा नहीं जा सकता। सोमवार, 3 सितंबर से शुक्रवार, 5 अक्टूबर तक बीएसई सेंसेक्स 10.27%, मिडकैप सूचकांक 16.67% और स्मॉलकैप सूचकांक 19.37% गिर चुका है। आशा अब निराशा में बदलने लगी है। ठीक महीने भर बाद दिवाली है। डर है कि इस बार की दिवाली कहीं काली न पड़ जाए। लेकिन संभलकर चुना जाए तो शुभ लाभ के बहुतेरे अवसर हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी