देशी-विदेशी संस्थाओ की खींचतान, एलआईसी पर बढ़ता बोझ और सिस्टम में नकदी के संकट की आशंका। ये हुए ढाई कारक, जिन्होंने इस वक्त भारतीय शेयर बाज़ार को मथ रखा है। ज्योतिष की भाषा में इस ढय्या कह सकते हैं। साढ़े साती में से ढाई कारक निकल गए तो बाकी बचे पांच कारक। कारक नहीं, बल्कि इन्हें अनिश्चितता कहा जाना चाहिए। पहली अनिश्चितता यह है कि आठ महीने बाद मोदी सरकार रहेगी या नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

इंफ्रास्ट्रक्चर व हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने कमर्शियल पेपर जैसे ऋण-प्रपत्रों में हाल में जिस तरह डिफॉल्ट किया, उससे डर लगा कि कहीं सिस्टम में नकदी का संकट न पैदा हो जाए। बैंकों के बढ़ते एनपीए का संकट पहले से था। सरकार एलआईसी पर आईडीबीआई बैंक का बोझ डाल चुकी है। वैसे, आईएल एंड एफएस में सत्यम की तरह नया निदेशक बोर्ड बना दिया गया है। पर, एलआईसी को ही उसका उद्धार करना होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में ज्वार-भाटे जैसे स्थिति है। निफ्टी 150 से 200 अंकों का उतार-चढ़ाव झेल रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि जहां विदेशी निवेशक संस्थाएं बराबर बेच रही हैं, वहीं म्यूचुएल फंड व बीमा कंपनियों जैसी देशी निवेशक संस्थाएं बराबर खरीद रही है। इनके बीच का असंतुलन बाजार में असामान्य हलचल का सबब बन जा रहा है। ऊपर से आईएल एंड एफएस जैसी कंपनियों के डिफॉल्ट ने परेशानी बढ़ा रखी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार की हालत इन दिनों डांवाडोल चल रही है। सुबह का जोश शाम तक ठंडा पड़ जाता है। दरअसल अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति ने इधर बाज़ार को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है। लगता है कि जैसे उस पर नकारात्मक तत्वों की साढ़े साती सवार हो गई हो। इस साढ़े साती के काल्पनिक नहींं, सचमुच के कारक हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्हें सुलझाना भी कतई आसान नहीं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी