इफरात धन दौड़ाता रहा है बाज़ार को
पांच-दस साल से जब से बाज़ार ग्लोबल हुआ है, तब से दुनिया भर की इफरात पूंजी भारतीय शेयर बाजार में आने लगी। अपने यहां भी अरबपति बढ़ते जा रहे हैं। भ्रष्ट नेताओं व नौकरशाहों का कालाधन घूम-फिरकर बाज़ार में आ रहा है। इस तरह सीमित मात्रा में उपलब्ध अच्छे स्टॉक्स का पीछा बहुत सारा धन करने लगा तो उनके भाव जमकर चढ़ गए। वहीं, बहुत सारी छोटी व अच्छी कंपनियां उपेक्षित रह गईं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
संस्थाएं व ऑपरेटर चलाएं अपना खेल
दुनिया के विकसित बाज़ारों का पता नहीं, लेकिन भारत जैसे विकासशील बाज़ार में बड़े निवेशकों या संस्थाओं की तिकड़मबाज़ी खूब चलती है। आपने देखा होगा कि अक्सर ढाई बजे के आसपास सेंसेक्स व निफ्टी का रुख तेज़ी से पलट जाता है। इसे बाज़ार के लोग फैंटम प्रभाव कहते हैं। इसके अलावा बाज़ार में बड़े-बड़े ऑपरेटर बैठे हैं जो चुनिंदा शेयरों में खेलते हैं। फाइनेंस, रियल्टी व मेटल कंपनियां इनकी मुट्ठी में रहती हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी
शेयरों में ट्रेडिंग करना विशुद्ध सट्टेबाज़ी
अगर आपको लगता है कि शेयरों के भाव आज, दो-चार या दस दिन बाद कहां जानेवाले हैं, इसका पता लगाने की कोई विद्या या विज्ञान है तो यह भ्रम दिमाग से खुरच-खुरचकर निकाल दीजिए। यहां कुछ भी पक्का नहीं। बस, अंदाज लगाया जाता है। हर कोई पुराने पैटर्न के टुकड़े पकड़कर आगे का अंदाज़ लगाता है। यह मूलतः विशुद्ध सट्टेबाज़ी है। लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का। हां, तिकड़मबाज़ी खूब चलती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी
लंबा निवेश कला है और विज्ञान भी
इस समय 400 से ज्यादा स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर 52 हफ्तों की तलहटी पकड़ चुके हैं। इसमें बहुत-सी अच्छी व मजबूत कंपनियां हैं। आठ साल पहले 2011 में भी ऐसी ही स्थिति आई थी। लेकिन उनके शेयर तेज़ी से उठे थे। इस बार भी देर-सबेर ऐसा होना है क्योंकि लंबे समय में शेयरों के भाव कंपनियों के धंधे के अनुरूप चलते हैं। यह विज्ञान है, जबकि उन्हें चुनना एक कला है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी







