शेयर बाज़ार में फैले ठगों ने देश में इक्विटी संस्कृति का स्वस्थ विकास रोक रखा है। इस संस्कृति का स्वस्थ विकास ज़रूरी है ताकि उद्योग को अवाम की रिस्क पूंजी मिले, आम लोग भी रिस्क को समझते हुए उद्योग के बढ़ने का फायदा उठाएं और देश का औद्योगिकीकरण हो जिससे रोज़गार के नए अवसरों का सृजन हो। अर्थकाम आम निवेशकों का रक्षा-कवच बनने में लगा है ताकि उन्हें ठगी से बचाया जा सके। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के गुर सिखाने के नाम पर भी निवेशकों के साथ ठगी हो रही है। ऐसे गुरु-घंटाल सोशल मीडिया या निजी संपर्कों का सहारा लेकर अपना जाल फेंकते हैं। वित्तीय आज़ादी की लालच में हर कोई इनके फ्री सेमिनार में चला जाता है। उसके बाद एकमुश्त 30-35 हज़ार फीस में आजीवन सिखाने का वादा। लेकिन उनका जालबट्टा कसता जाता है और आप उनके मकड़जाल में कीट की तरह फंसते चले जाते हो। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ब्रोकर आम निवेशकों को कैसे ठगते हैं, इसके किस्से मुंबई ही नहीं, जयपुर व इंदौर से लेकर लुधियाना, बनारस, कानपुर, मेरठ व रांची तक बिखरे हुए मिल जाएंगे। यह खेल ब्रोकरों से जुड़ी फ्रैंचाइजी जमकर करती हैं। जिस ब्रोकर का दायरा जहां तक फैला है, वह वहां तक निवेशकों के साथ फ्रॉड करता है। वो निवेशकों से ली गई पावर ऑफ एटॉर्नी का फायदा उठाते हैं। कमीशन के लिए जमकर सौदे करते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अर्थकाम ने अपनी शुरुआत ही बीएसई में लिस्टेड एक इक्विटी रिसर्च कंपनी के साथ गठजोड़ से की थी ताकि पाठकों को शेयर बाज़ार की रिसर्च आधारित सूचनाएं दी जा सकें। हम पूरी शिद्दत से उससे मिली सूचनाएं और सिफारिशों को पेश करते रहे। लेकिन दो साल बीतने से पहले ही साफ हो गया कि उक्त कंपनी कहीं से भी निष्पक्ष नहीं है और ऑपरेटरों के साथ मिलकर रिटेल निवेशकों को चरका पढ़ाती है। अब मंगल की दृष्टि…और भीऔर भी

वित्तीय बाज़ार के दूसरे क्षेत्रों की बात मैं नहीं जानता। पर दस साल के अपने अनुभव से भलीभांति जान गया हूं कि अपने शेयर बाज़ार में हर तरफ ठगों की भरमार है। ब्रोकरेज़ फर्मों से लेकर रिसर्च कंपनियां तक रिटेल निवेशकों को झांसा देने का काम करती हैं। करोड़ों की पूंजीवाले ग्राहकों से इनसे रिश्ते अलग रहते होंगे। लेकिन 20-25 लाख तक की पूंजीवाले सामान्य निवेशकों को चरका पढ़ाना इनके डीएनए में है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी