आमतौर पर लंबे समय का निवेश बहुत बोरिंग होता है। उसमें अचंभे या थ्रिल जैसी कोई चीज़ नहीं। वहीं, ट्रेडिंग में अचंभा ही अचंभा होता है। वहां पल-पल का थ्रिल है। यही वजह है कि बहुत से लोग नफे-नुकसान की परवाह किए बगैर इस थ्रिल के आदी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि आखिरकार सब कुछ लुटाकर ड्रग एडिक्ट की तरह कहीं के नहीं रहते। हमें इस एडिक्शन से बचना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

निवेशक कंपनी की मूलभूत मजबूती व लाभप्रदता के दम पर दौलत बनाने के लिए रिस्क लेता है, जबकि ट्रेडर कंपनी के शेयरों की गति, लहरों के उसके स्वभाव पर दांव लगाकर कमाता है। दोनों ही रिस्क लेते हैं। निवेशक का रिस्क ज्यादा नहीं होता, जबकि ट्रेडर जमकर रिस्क लेता है। कम रिस्क तो कम रिटर्न और ज्यादा रिस्क तो ज्यादा रिटर्न। यह शाश्वत नियम बाज़ार में काम करता है। कोई इससे ऊपर नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

साल 2018 का आखिरी दिन। इस दौरान पहली जनवरी से लेकर 28 दिसंबर तक बारह महीनों में निफ्टी-50 मात्र 4.07% और सेंसेक्स 6.69% बढ़ा है। वहीं, बीते हफ्ते अडानी पोर्ट्स 7.5% बढ़ गया। यह होता है लंबे निवेश और छोटी अवधि की ट्रेडिंग का फर्क। अगर कोई इंसान सतर्क रहे और शेयर बाज़ार व स्टॉक्स के स्वभाव को भलीभांति समझ ले तो ट्रेडिंग से लंबे निवेश की बनिस्बत कहीं ज्यादा कमा सकता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

पुराना साल गया। नए साल में लालच के छल्ले फेंकने का दौर चालू है। ब्रोकर दस-बीस स्टॉक उछालकर उनमें साल भर में 20-30% कमाई का दावा कर रहे हैं। लेकिन गौर करें तो ये सभी स्टॉक्स पहले से काफी बढ़ चुके हैं। यह है आम दृष्टि के दोहन का फॉर्मूला क्योंकि लोगबाग चढ़े-बढ़े हुए के पीछे ही भागते हैं। लेकिन शेयर बाज़ार में निवेश से कमाई खास दृष्टि से होती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

केवल 5% पूंजी ही ट्रेडिंग में लगानी चाहिए। रिटेल निवेशकों के लिए यह नियम बहुत खास है। शेयर बाज़ार के लिए अलग निकाले गए धन या अपनी सभी वर्तमान व भावी ज़रूरतों की गणना के बाद बचे इफरात धन का 95% हिस्सा उन्हें लंबे निवेश में लगाना चाहिए। इसका 50-60% भाग लार्जकैप, 30-40% मिडकैप और 20-30% स्मॉलकैप में लगाना चाहिए। नए साल में इस नियम का पालन करें तो वह शुभ ही होगा। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी