मेल पारदर्शिता व अच्छी कमाई का
सेवा के लिए बनी राजनीति आज देश में जबरदस्त मुनाफा कमानेवाला धंधा बन गई है। लेकिन क्या इस क्षेत्र में कंपनियां बनाकर लिस्ट करवा दी जाए तो उनका मूल्यांकन बहुत ज्यादा होगा? नहीं, क्योंकि राजनीति के धंधे में पारदर्शिता नहीं है और जहां पारदर्शिता नहीं है, वहां मूल्यांकन नहीं हो सकता। हालांकि इससे इतर तमाम धंधे हैं जहां पारदर्शिता और अच्छी कमाई दोनों ही हैं। उनमें निवेश लाभ का सौदा है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी
चुनावों में कालाधन करता है अट्टाहास
इसमें कोई दो राय नहीं कि लाख हो-हल्ले के बावजूद हमारे चुनावों में कालाधन बड़ी अहम भूमिका निभाता है। एक अपुष्ट अनुमान है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में लगभग 18,000 करोड़ रुपए का कालाधन इस्तेमाल हुआ था। इसमें से अकेले भाजपा ने करीब 10,000 करोड़ रुपए खर्च किए थे। इस बार के लिए कुछ जानकारों का अनुमान है कि कालेधन का आंकड़ा आराम से 25,000 करोड़ रुपए के पार जा सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
सतह के तारकोल की कौन करे जांच
चुनावी माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की अप्रत्याशित सक्रियता की वजह क्या है? इसकी जांच गहराई से होनी चाहिए। पर, मुख्यधारा का मीडिया ऐसा करेगा नहीं, बिजनेस चैनलों व अखबारों की भी इसमें कोई रुचि नहीं होगी, सरकार ऐसा करेगी नहीं और पूंजी बाज़ार नियामक संस्था सेबी भी शायद इस झंझट में न पड़ना चाहे। ऐसे में शक का उठना लाज़िमी है कि कहीं भारतीय धन ही तो घूमकर वापस नहीं आ रहा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी
चुनावी मौसम में क्यों हैं उमड़े विदेशी
भारतीय शेयर बाज़ार में अजब उलटबांसी चल रही है। अनिश्चितता से भरे माहौल में विदेशी निवेशक अमूमन धन निकाल लेते हैं। अर्थव्यवस्था कमज़ोर होने पर यह गति ज्यादा ही तेज़ हो जाती है। लेकिन जिन एफआईआई ने साल 2018 में अपने बाज़ार से 33,014 करोड़ रुपए निकाले और इस साल जनवरी में भी 4262 करोड़ निकाल डाले, उन्होंने 20 फरवरी के बाद से कल तक 41,904 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी







