स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग के बिजनेस का अभिन्न हिस्सा है। इसको इस बिजनेस की लागत भी कहा जाता है। बड़े से बड़ा कामयाब ट्रेडर भी इससे बच नहीं पाता। लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि हमारे मन में गहरे बैठा है कि हमें कभी नाकाम नहीं होना, घाटा नहीं खाना है। इस विचार या मान्यता के चलते हम स्टॉप-लॉस की वास्तविकता को मनोवैज्ञानिक रूप से पचा नहीं पाते और तनाग्रस्त हो जाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हमारे विचारों, भावनाओं और बर्ताव से तय होता है कि हम ट्रेडिंग या दूसरी गतिविधि से क्या परिणाम हासिल करते हैं। विचार बनते हैं हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, मूल्यों, दृष्टिकोण व रुझान से। जब भी किसी घटना पर हमारा ध्यान जाता है तो विचार सक्रिय हो जाते हैं और हमारा दिमाग फटाफट न्यूरोन्स दागना शुरू कर देता है। मसलन, स्टॉप-लॉस की नौबत आ जाए तो हम इस तरह घाटा खाना स्वीकार नहीं कर पाते। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

लालच व डर, यही दो भावनाएं हैं जिन पर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग का सारा खेल चलता है। लेकिन ये भावनाएं हमारे अंदर आखिर काम कैसे करती हैं? एड्रेनल ग्लैंड की चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं। यह हमारे मस्तिष्क में भावनाओं के स्रोत लिम्बिक सिस्टम में शामिल है। वहां इसके अलावा हिप्पोकैम्पस, हाइपोथैलमस, पिट्यूटरी व अमिगडाला जैसे अंग हैं। यही हमारे भीतर डर, चिंता व संदेह जैसे भाव पैदा करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

भावनाएं जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे स्वस्थ जीवन के लिए निहायत ज़रूरी हैं। लेकिन उन्हें अगर पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वे हमें बरबाद कर सकती हैं। जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह यह बात वित्तीय बाजार की ट्रेडिंग पर भी लागू होती है। ट्रेडिंग में सफलता की राह खोलने के लिए हमें अपने पूर्वाग्रहों के साथ-साथ उस झोंक को भी समझना होता है जिसमें आकर हम फैसले करते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं। देश में करोड़ों दिलों की रुकी हुई घड़कनें अब चलने लगी हैं और दिमाग काम करने लगा है। इसलिए फेंकने-हांकने या हवाहवाई बातें करने के बजाय उस ठोस कार्यभार को समझने की ज़रूरत है जो देश की नई सरकार के सामने मौजूद है। समय बहुत कम है क्योंकि तीन साल बाद ही 2022 में हम आज़ादी की 75वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं। तीन साल में नया भारत बनाऔरऔर भी