चुनावों के नतीजे यकीनन दो-चार, दस-पंद्रह दिन शेयर बाज़ार पर असर दिखाते हैं। लेकिन बाद में सब सामान्य हो जाता है। विदेशी निवेशकों के आने पर फर्क नहीं पड़ता, न ही घरेलू निवेशकों का जोश कमबेशी होता है। लंबे समय में भारत की विकासगाथा का दमखम बरकरार है तो शेयर बाज़ार तरन्नुम में उड़ता रहता है। केंद्र में एक दलीय बहुमत की सरकार हो या गठबंधन की सरकार हो, बाज़ार चहकता रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार मानकर चल रहा है कि चुनावों के बाद भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी, भले ही एनडीए का बहुमत पहले से घट जाए। नतीजे इससे उलट हुए तो बाज़ार उस दिन भारी गिरावट का शिकार हो सकता है। 2004 में चुनाव परिणाम के दिन बाज़ार 15% से ज्यादा टूटा था। हालांकि 2009 में यूपीए के दोबारा चुने जाने पर 20% उछल गया था। लेकिन क्या चुनावी सन्निपात का असर ज्यादा खिंचता है? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

तथ्य छिपाए जा रहे हैं। मतदाताओं को खींचने के लिए मनगढ़ंत बातें और डर फैलाया जा रहा है। हल्ला है कि सरकार बदली तो शेयर बाज़ार धराशाई हो सकता है। यह सारा शोर मचाया जा रहा है सत्ताधारी व सबसे अमीर पार्टी की तरफ से। वह अपने मकसद में कितना कामयाब होगी, यह तो 23 मई को नतीजे आने पर ही पता चलेगा। फिर भी हमें शोर और सच का अंतर समझना होगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सेवा के लिए बनी राजनीति आज देश में जबरदस्त मुनाफा कमानेवाला धंधा बन गई है। लेकिन क्या इस क्षेत्र में कंपनियां बनाकर लिस्ट करवा दी जाए तो उनका मूल्यांकन बहुत ज्यादा होगा? नहीं, क्योंकि राजनीति के धंधे में पारदर्शिता नहीं है और जहां पारदर्शिता नहीं है, वहां मूल्यांकन नहीं हो सकता। हालांकि इससे इतर तमाम धंधे हैं जहां पारदर्शिता और अच्छी कमाई दोनों ही हैं। उनमें निवेश लाभ का सौदा है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी