मतगणना जारी है। शाम होते-होते साफ हो जाएगा कि भावनाओं के उबाल और तिकड़मबाज़ी की जीत हुई है या देश के व्यापक अवाम ने अपने वास्तविक हितों को ध्यान में रखते हुए वोट दिया है। स्पष्ट हो जाएगा कि देश के अगले पांच साल का फैसला दिल से लिया गया है या बुद्धि से। बुद्धि से फैसला नहीं हुआ तो राजनीतिक गठबंधन की जीत के बावजूद देश हार जाएगा। यकीनन, यह दुभार्ग्यपूर्ण होगा। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सारा देश दिल थामकर 17वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों का इंतज़ार कर रहा है। लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचिए कि अगर पुलवामा व बालाकोट नहीं हुआ होता, तब भी क्या मोदी सरकार अपने काम के दम पर लोगों को इस तरह खींच पाती? यह है तो काल्पनिक सवाल, लेकिन प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि भावनाओं के उबाल पर ली गई कोई प्रतिक्रिया जनमत का असली प्रतिनिधित्व नहीं करती। सवाल देश के पांच साल का है! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार विशुद्ध धंधा है। वहां बुद्धि की तलवार लेकर भावनाओं से खेलना स्वाभाविक है। मगर, राजनीति पहले धंधा नहीं, सेवा हुआ करती थी। उसे अब भी ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन आज का कड़वा सच है कि धर्म की तरह राजनीति भी सबसे कम समय में सबसे ज्यादा कमाने का धंधा बन गई है। इसमें सच नहीं, महज झांकी पेश की जाती है। विज्ञापनों के शोर में सच गायब हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जो भावनाओं में बहता है, वो हारता है और जो भावनाओं से खेलता है, वो जीतता है। राजनीति और शेयर बाज़ार, दोनों का सच यही है। राजनीति और शेयर बाज़ार में धंधा करनेवाले लोग भावनाओं को समझकर उनसे खेलते हैं। हम टीवी चैनलों पर जो एक्जिट पोल देखते हैं, वह भी धंधा है, उसी तरह जैसे एनालिस्ट बिजनेस चैनलों पर अपना ज्ञान बघारते हैं। सही निकल गया तो वाह-वाह। गलत निकला तो सन्नाटा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार से आप ज्यादा रिटर्न महज इसलिए नहीं कमाते कि आपने बहुत जटिल बिजनेस मॉडल वाली कंपनी में निवेश किया है। कंपनी ऐसी होनी चाहिए जिसका बिजनेस मॉडल आपको अच्छी तरह समझ में आ जाए। साथ ही उसके धंधे में एंट्री बैरियर इतना तगड़ा होना चाहिए कि दूसरा आसानी से घुस न पाए। वह एक-एक कदम भी बढ़ती रही तो काफी है, दस कदम की छलांग लगाने की ज़रूरत नहीं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी