शेयर बाज़ार जिस तरह से काम करता है, उसमें भावों का बढ़ना धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से होता है। असल में तेज़ी का बाज़ार हमेशा धीरे-धीरे करके बनता है, एकबारगी नहीं। वह एक-एक कदम, एक-एक सीढ़ी चढ़ता है। इसकी सीधी-सी वजह है कि भरोसे को बनने और बढ़ने में वक्त लगता है। इसलिए तेज़ी के बाज़ार में मौके हाथ से खटाक से नहीं निकल जाते। चूक जाने पर उन्हें दोबारा पकड़ा जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हर दिन सैकड़ों स्टॉक्स 52 हफ्ते की नई तलहटी पकड़ रहे हैं। शुक्रवार को ही एनएसई में 293 स्टॉक्स ने तलहटी पकड़ ली। छोटी कंपनियों की हालत ज्यादा ही खस्ता है। बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक जनवरी 2018 के शिखर से 35% से ज्यादा गिर चुका है। एक अध्ययन के मुताबिक 2010 के बाद से जो 228 स्टॉक्स 75% से ज्यादा गिरे हैं, उनमें से केवल आठ पुरानी ऊंचाई पर लौट सके। निराशा के बीच आशा जगाती एक कंपनी…औरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सारा मंसूबा इस पर टिका है कि देश में भरपूर विदेशी निवेश आएगा। शेयरों के साथ उद्योग में भी। पर बिजनेस करने की आसानी के दावों के बावजूद विदेशी निवेशकों को चीन, वियतनाम या थाईलैंड ज्यादा रास आते हैं। कारण स्पष्ट है। विश्व व्यापार में हमारा हिस्सा 2% से कम है जबकि हमारे यहां ट्रांसफर-प्राइसिंग विवाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

भारत में अपनी पूंजी की कमी नहीं है। लेकिन कमाल यह है कि हमारे पूंजी बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार के रुख का फैसला विदेशी निवेशक करते हैं। यह हमारे बाज़ार की एक कड़वी हकीकत है जिसे हर किसी को स्वीकार करना पड़ेगा। वैसे तो विदेशी संस्थागत निवेशकों और देशी संस्थागत निवेशकों में हमेशा जुगलबंदी चलती है। एक बेचता तो दूसरा खरीदता है। लेकिन विदेशी 350 करोड़ से ज्यादा बेचें तो बाज़ार गिरता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के रूप में आखिर किसका धन आकर भारतीय शेयर बाज़ार में लगता है? इस बार मई में, जब चुनावों की अनिश्चितता छाई हुई थी, तब ऐसे निवेशक क्यों चढ़े हुए बाज़ार में भी झूमकर धन लगा रहे थे? जाननेवाले सब जानते हैं। मॉरीशस जैसे रूट बंद हो जाने पर भी कालेधन का रास्ता बंद नहीं हुआ है। नहीं तो चुनावों में 60-70 हज़ार करोड़ का कालाधन कैसे लग जाता! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी