दुनिया हमेशा से भौतिक रही है और आगे भी रहेगी। लेकिन इसके सारे रिकॉर्ड, खासकर वित्तीय लेनदेन से जुड़े माध्यम डिजिटल होते जा रहे हैं। मुमकिन है कि भविष्य में भौतिक मुद्रा ही पूरी तरह खत्म हो जाए। इस पूरी प्रक्रिया ने बिजनेस की नई धारा पैदा कर दी है। यह एक ऐसा बिजनेस है जो दवा, इलाज व तेल-साबुन व टूथपेस्ट जैसे एफएमसीजी उत्पादों की तरह सदाबहार है। आज तथास्तु में इसी बिजनेस से जुड़ी कंपनी…औरऔर भी

म्यूचुअल फंड इक्विटी के बजाय बांड भी ज्यादा धन लगा रहे हैं। एनपीए के बोझ से दबे बैंक भी बिगड़े माहौल में शेयर बाज़ार में निवेश से दूर हैं। फिर आखिर कौन-सी देशी संस्थाएं हैं जो बाज़ार में निवेश बढ़ा रही हैं? जानकारों की मानें तो पिछले कुछ महीनों में शेयर बाज़ार में अधिकांश खरीद एलआईसी ने की है। स्वेच्छा नहीं, बल्कि सरकार के दबाव में। सरकार ने उसको मोहरा बना रखा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बजट के बाद शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों का रुख क्या रहा है, इसका तो ठीकठीक पता नहीं। लेकिन ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक बीते अगस्त माह में इनमें कुल 1.02 लाख करोड़ रुपए का निवेश आया है। इसमें से 79,000 करोड़ से ज्यादा धन उनकी लिक्विड या अल्पकालिक बांड स्कीमों में लगा है, जबकि मात्र 9090 करोड़ रुपए इक्विटी स्कीमों में। यह शेयर बाज़ार से आम निवेशकों की बढ़ती बेरुखी को दिखाता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

देशी निवेशक संस्थाएं विदेशी संस्थाओं या एफआईआई से ज्यादा खरीद रही हैं। फिर भी शेयर बाज़ार गिरता जा रहा है। कारण यह कि एफआईआई ही बाज़ार का सेंटीमेंट तय करते हैं। उनके बेचने पर ब्रोकरों से लेकर रिटेल निवेशक तक बेचने लगते हैं। म्यूचुअल फंड भी अमूमन ऐसे दौर में बेचते हैं क्योंकि उनमें रिटेल निवेशकों का ही धन जमा होता है और उनके रिडेम्पशन की मांग उन्हें बेचकर पूरी करनी पड़ती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी