विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) जुलाई से अब तक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से 34,275 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। बजट के दिन से लेकर अब तक के दो महीने में निफ्टी 8.38% गिर चुका है। वह भी तब, जब जुलाई से अब तक देशी निवेशक संस्थाओं (डीआईआई) ने कैश सेगमेंट में एफपीआई से ज्यादा 45,791 करोड़ रुपए डाले हैं। ऐसा न हुआ होता तो बाज़ार न जाने कितना गिर गया होता! अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में अभी जिस तरह की निराशा छाई है, वैसे कभी नहीं रही। सेंसेक्स और निफ्टी तो फिर भी संभले हुए हैं। लेकिन बाकी बाज़ार धराशाई है। पिछले 20 महीनों में बीएसई मिडकैप सूचकांक 28% और स्मॉलकैप सूचकांक 40% गिर चुका है। किसी को भरोसा नहीं कि यह दुर्दशा कब खत्म होगी। लेकिन यही वह आदर्श स्थिति है जब समझदार निवेशक बाज़ार में निवेश करने या बढ़ाने लगते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

राजनीति में झूठ और अहंकार चलता है। लेकिन अर्थनीति में यह रवैया सत्यानाश कर डालता है। जून 2019 की तिमाही में हमारा जीडीपी मात्र 5% बढ़ा है। यह 25 तिमाहियों की न्यूनतम विकास दर है। चीन का जीडीपी इसी दौरान 6.2% बढ़ा है तो सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हम नहीं रहे। सरकारी मंत्री दावा कर रहे हैं कि हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, जबकि हम सातवें नंबर पर हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अकेले शेयर बाज़ार में घबराहट होती तो संभल जाती। दिक्कत यह है कि सरकार तक घबराई हुई दिख रही है। लगता है कि उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। रिजर्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपए का सरप्लस खींचना और दस सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बैंक बनाना यही संकेत देता है। जब चहुंओर आर्थिक सुस्ती का आलम हो और व्यापार-युद्ध के बीच वैश्विक अनिश्चितता बढ़ रही हो, तब इसका क्या औचित्य था! अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी