एलआईसी में शेयरधारक के नाते सरकार की कुल निधि 650.37 करोड़ रुपए है, जबकि उसमें करोड़ों बीमाधारकों की कुल निधि 27.92 लाख करोड़ रुपए है। यानी, सरकार की निधि के चार हज़ार गुना से भी ज्यादा। फिर भी सरकार ने एलआईसी को अपनी जायदाद समझ रखा है। उसके इस रवैये से ही इक्विटी निवेश से एलआईसी का लाभ बीते वित्त वर्ष में सेंसेक्स के 17% बढ़ने के बावजूद 7.89% घट गया। अब करते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

तेरह दिन पहले कैबिनेट ने आईडीबीआई बैंक में 9300 करोड़ रुपए की पूंजी डालने का फैसला किया। इसमें से 4743 करोड़ एलआईसी को लगाने हैं तो 4557 करोड़ केंद्र सरकार को। कारण, सरकार पहले ही आईडीबीआई बैंक की 51% इक्विटी एलआईसी को बेच चुकी है तो अब उसे इस डूबते बैंक को कंधा देना ही पड़ेगा। लेकिन आखिर सरकार के कहने पर वह करोड़ों बीमाधारकों का भविष्य कैसे दांव पर लगा सकती है? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

दुनिया हमेशा से भौतिक रही है और आगे भी रहेगी। लेकिन इसके सारे रिकॉर्ड, खासकर वित्तीय लेनदेन से जुड़े माध्यम डिजिटल होते जा रहे हैं। मुमकिन है कि भविष्य में भौतिक मुद्रा ही पूरी तरह खत्म हो जाए। इस पूरी प्रक्रिया ने बिजनेस की नई धारा पैदा कर दी है। यह एक ऐसा बिजनेस है जो दवा, इलाज व तेल-साबुन व टूथपेस्ट जैसे एफएमसीजी उत्पादों की तरह सदाबहार है। आज तथास्तु में इसी बिजनेस से जुड़ी कंपनी…औरऔर भी

म्यूचुअल फंड इक्विटी के बजाय बांड भी ज्यादा धन लगा रहे हैं। एनपीए के बोझ से दबे बैंक भी बिगड़े माहौल में शेयर बाज़ार में निवेश से दूर हैं। फिर आखिर कौन-सी देशी संस्थाएं हैं जो बाज़ार में निवेश बढ़ा रही हैं? जानकारों की मानें तो पिछले कुछ महीनों में शेयर बाज़ार में अधिकांश खरीद एलआईसी ने की है। स्वेच्छा नहीं, बल्कि सरकार के दबाव में। सरकार ने उसको मोहरा बना रखा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी