शेयर बाज़ार का पूरा और अलग-अलग स्टॉक्स का स्वभाव पूरी तरह रैंडम है। उसकी चाल को किसी पक्के नियम में नहीं बाधा जा सकता। बहुत हुआ तो दो-चार, दस दिन या एकाध महीने में उठने-गिरने की प्रायिकता निकाली जा सकती है। ऐसी अनिश्चितता के बीच ट्रेडिंग की बाहरी सलाहें केवल अपना धंधा चमकाने के लिए होती हैं। वे चाहें भी तो किसी स्टॉक या इंडेक्स के उठने-गिरने का पक्का स्तर नहीं बता सकते। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

कहने को हम कह सकते हैं कि जिस केयर रेटिग्स को सोमवार को 525 पर खरीदने को कहा था, वो उस दिन एंट्री का मौका देने के बाद पांच दिन के अंदर ही 27.13% बढ़त के साथ 668 पर पहुंच गया, वह भी शुक्रवार को 4.17% गिरने के बाद। लेकिन हम यही कहते हैं कि अगर आप बाहरी सलाह लेकर शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं तो यह सोच आत्मघाती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कंपनियों की मूलभूत मजबूती कभी-कभी उनके शेयरों के भाव में नहीं झलकती। ऐसा प्रायः कम अवधि, कुछ महीने या साल तक होता है। लंबी अवधि में शेयरों के भाव कंपनी की मजबूती पकड़ लेते हैं। इसीलिए लंबी अवधि का निवेश छोटी अवधि की ट्रेडिंग से कम रिस्की होता है। इस पर अगर कंपनी के पास विपुल आस्तियां हों तो अंततः उसका दम शेयरों में दिख ही जाता है। तथास्तु में आज ऐसी ही विपुल आस्तियों वाली कंपनी…औरऔर भी

हर व्यापार में शुरुआती पूंजी चाहिए और अपनी मेहनत व समय के ऊपर उसमें कुछ लागत लगती है। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में यह लागत क्या है? आपको जितना स्टॉप-लॉस उठाना पड़ता है, वह इस ट्रेडिंग की लागत है। किसी एक सौदे में 2% और महीने भर 6% प्रतिशत से ज्यादा नुकसान हो जाए तो उस महीने ट्रेडिंग नहीं करनी चाहिए। हमेशा ध्यान रहे कि हमारा लक्ष्य न्यूनतम रिस्क में अधिकतम कमाना है। अब शुक्रवार का अभ्यास…और भीऔर भी