भागना उचित होगा या डटे रहना!
अमेरिका में बेरोजगारी 1929 की महामंदी के बाद सबसे बदतर अवस्था में है। चीन पहले से त्रस्त है। भारत की विकास दर का अनुमान मूडीज़ ने शून्य कर दिया है। कुछ अर्थशास्त्री तो इसके ऋणात्मक होने की गणना कर रहे हैं। शेयर बाज़ार से निवेशक दूर भाग रहे हैं। अप्रैल में इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीमों में निवेश 47% घट गया है। ऐसे में भागना उचित है या डटे रहना। तथास्तु में इसका जवाब एक कंपनी के साथ…औरऔर भी
पिछली नहीं, खेलती है भावी चंचलता
ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का भाव तो बाजार निर्धारित करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो भाव बेचनेवाले तय करते हैं, खरीदनेवाले नहीं। फिर भी रिटेल ट्रेडर के पास यह सुविधा होती है कि वह अपने अध्ययन व समझ से यह परख सकें कि बाज़ार में चल रहा ऑप्शन का भाव सही है या नहीं। अगर उसके भाव बढ़ाकर रखे गए हैं तो वह बिना लालच में फंसे उससे दूर रह सकता है और किसी वजह से वाजिब याऔरऔर भी
सूत्र तो ठीक, मगर चंचलता का क्या!
ऑप्शन के भाव निकालने के अलग-अलग मॉडल हैं। हमने बायनॉमिअल मॉडल पर नज़र डाल ली। अब ब्लैक-शोल्स मॉडल को गहराई से समझने की बारी है। साथ ही एडिसन ह्वेल (Adison Whaley) मॉडल भी है। कोई इस मॉडल को परिष्कृत बताता है तो कोई उसे। पर हमें उसी मॉडल को लेना चाहिए जिसकी गणना आसानी से की जा सके। बायनॉमिअल मॉडल में प्रायिकता से लेकर बांड के रिटर्न के साथ मिलान जैसी ऐसी उलझनें हैं कि माथा घूमऔरऔर भी
वहां जो उलझा था, यहां बड़ा आसान
हमने बायनॉमिअल प्राइसिंग मॉडल में बैंकवर्ड इंडक्शन करते हुए ऑप्शन का भाव पोर्टफोलियो के मिलान या रेप्लिकेशन से निकाला। हमने यह भी देखा कि गिनने में यह तरीका ज्यादा ही जटिल है। मात्र दो ही चरणों में बहुत सारी गणनाएं करनी पड़ीं। इसकी तुलना में रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन इस मॉडल का काफी आसान तरीका है। इसमें गणना कई चरणों में नहीं करनी पड़ती। सब कुछ आसान व सहज है। वैसे, यह कैसे काम करता है और इसमेंऔरऔर भी









