कल हमने ऑप्शन ट्रेडिंग रणनीति के अंतर्गत कवर्ड कॉल, प्रोटेक्टिव पुट, बुल स्प्रेड और बियर स्प्रेड की चर्चा की। आज हम बटरफ्लाई स्प्रेड, स्ट्रैडल और स्ट्रैंगल रणनीति को समझने की कोशिश करेंगे। ये तीनों ही डेल्टा न्यूट्रल रणनीतियां हैं। इनमें हम स्टॉक की तेजी या मंदी को नहीं, बल्कि उसकी वोलैटिलिटी को आधार बना कर ट्रेडिंग रणनीति तैयार करते हैं। हम जान चुके हैं कि वोलैटिलिटी ज्यादा हो तो ऑप्शन के भाव चढ़ जाते हैं और तबऔरऔर भी

जब हम भारत की बात करते हैं तो व्यापक अर्थों में उसका मतलब होता है वह भारत, जिसका राष्ट्रीय हितों से अलग अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं है। न कोई राजनीतिक स्वार्थ और न ही आर्थिक स्वार्थ। इस अर्थ में देशी या विदेशी निजी कंपनियों के हाथों में राष्ट्रीय रणनीतिक व सामरिक महत्व के उद्योग-धंधे और कोयले जैसी भू-संपदा सौंपकर हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने का दावा कतई नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए कि जहां सरकार काऔरऔर भी

जिस तरह शेयरों के निवेश में पोर्टफोलियो बनाकर रखना होता है ताकि एक का नुकसान दूसरे के फायदे से बराबर होता रहे और हम अपना नुकसान कम से कम रखते हुए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें, उसी तरह ऑप्शन ट्रेडिंग में भी न्यूनतम नुकसान और अधिकतम मुनाफे की रणनीति बनानी पड़ती है। हम पहले ही देख चुके हैं कि ऑप्शन का भाव बाज़ार में वाजिब है या गलत, इसे परखने का कोई पक्का फॉर्मूला या लिटमसऔरऔर भी

अजीब विडंबना है। ऑप्शन मूल्य के ब्लैक-शोल्स मॉडल को भले ही दो नोबेल पुरस्कार विजेता गणितज्ञों ने तैयार किया हो, पर यह पूरे सच को नहीं पकड़ पाता। ऑप्शन का स्ट्राइक मूल्य, संबधित स्टॉक/इंडेक्स का बाज़ार मूल्य, रिस्क-फ्री ब्याज की दर और एक्सपायरी में बची अवधि या लाभांश यील्ड जैसे कारकों के आंकड़ों को लेकर किसी भ्रम या दुविधा की गुंजाइश नहीं। पर इस फॉर्मूले से ऑप्शन का जो भाव निकलता है, वह बाज़ार में चल रहेऔरऔर भी

लॉकडाउन के बावजूद कोरोना का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। अपने यहां कोरोना के मरीजों की संख्या चीन से ज्यादा हो चुकी है। 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज फिलहाल खोखला दिख रहा है। ऐसे में वही कंपनियां मैदान में डटी रह सकती हैं जिनकी बैलेस शीट तगड़ी हो और जिनके उत्पाद व सेवाओं में इतना दम हो कि वे कोरोना की मार के बावजूद अपना बाज़ार बढ़ा सकें। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी