‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा है महज़ राजनीतिक जुमला!

जब हम भारत की बात करते हैं तो व्यापक अर्थों में उसका मतलब होता है वह भारत, जिसका राष्ट्रीय हितों से अलग अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं है। न कोई राजनीतिक स्वार्थ और न ही आर्थिक स्वार्थ। इस अर्थ में देशी या विदेशी निजी कंपनियों के हाथों में राष्ट्रीय रणनीतिक व सामरिक महत्व के उद्योग-धंधे और कोयले जैसी भू-संपदा सौंपकर हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने का दावा कतई नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए कि जहां सरकार का कोई निजी स्वार्थ नहीं होता, वहीं हर निजी कंपनी का स्वार्थ हमेशा अपने मुनाफे को अधिकतम करना होता है। ऐसा करना उसके बने रहने, उसके अस्तित्व के टिके रहने के लिए ज़रूरी है।

ऐसे में देशी-विदेशी निजी कंपनियों के भरोसे भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात करना आर्थिक रूप से पूरी तरह सफेद झूठ और छद्म है। उसी तरह जैसे कोई निजी कंपनी अगर बॉन्ड जारी करके कहे कि उसका बॉन्ड राष्ट्रीय है, रिस्क-फ्री बॉन्ड है और उस पर दी जानेवाली ब्याज रिस्क-फ्री है। किसी भी देश में उसकी सरकार द्वारा जारी किए गए बॉन्ड ही रिस्क-फ्री बॉन्ड होते हैं।

दरअसल, केंद्र की मोदी ने इस कोरोना काल में आत्मनिर्भर भारत का जो शिगूफा छोड़ा है, वह कहीं से भी आर्थिक स्वावलंबन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक बेहद मजबूत राजनीतिक जुमला है। ऐसा इसलिए अगर कोई भी विपक्षी इसकी आलोचना करे या मीनमेख निकाले तो मोदी एंड गैंग बहुत आसानी से कह सकता है कि देखो, ये तो राष्ट्रद्रोही हैं, राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हैं, भारत को आत्मनिर्भर बनाने की राह में रोड़ा अटका रहे हैं। यह नारा देकर नरेंद्र मोदी ने एक तुरुप का पत्ता चला है और सारे विरोधियों के मुंह बंद कर दिए हैं। विरोधी यह भी नहीं कह सकते कि कोरोना के संकट में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करना पूरी तरह बेतुका है।

आइए, देखते हैं कि मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा कैसे आर्थिक रूप से पूरी तरह फिसड्डी है। हालांकि इसको छिपाने के लिए उन्होंने शुरू में ही जाल फेंक दिया था कि, “भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार, उस आत्मनिर्भरता की बात करते हैं जिसकी आत्मा वसुधैव कुटुंबकम है। भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है तो आत्मकेंद्रित व्यवस्था की वकालत नहीं करता।”

यह वाक्य ही दिखा देता है कि मोदी जी भले ही कहें कि उन्होंने आपदा को अवसर में बदल दिया। लेकिन दरअसल, उन्होंने अवसरवाद की पूरी गुंजाइश बना रखी थी। यही वजह है कि 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज के शोर में सरकार ने बड़ी आसानी से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने और रक्षा उत्पादन जैसे संवेदनशील क्षेत्र को ऑटोमेटिक रूट से 74 प्रतिशत विदेशी स्वामित्व के लिए खोल दिया गया, जबकि स्वदेशी विरोध के चलते पहले यह सीमा 49 प्रतिशत रखी गई थी। लेकिन मोदी सरकार की मौकापरस्ती देखिए कि उसने कोरोना संकट के बीच इस स्वदेशी आवाज़ को दबा दिया। यही नहीं, देश के भविष्य से संबंधित जिन अहम नीतिगत फैसलों संसद से पारित करवाना चाहिए, उन्हें संकट का बहाना बनाकर प्रधानमंत्री मोदी बिना किसी चर्चा के लागू करवाने पर आमादा हैं।

मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत का नारा आज मजाक बन चुका है, आम ही नहीं, खास लोगों में भी। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार के Self-Reliance का मतलब है अपनी रक्षा करना और रिलायंस की सेवा करना। ध्यान रहे कि साढे पांच साल पहले सितंबर 2014 में उन्होंने जिस मेक-इन इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की थी, वह आज पूरी तरह फेल हो चुका है। इन कार्यक्रम के मूल में था कि विदेशी कंपनियां भारत में उत्पादन करेंगी और दुनिया भर में निर्यात करेंगी। इससे देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान बढ़ जाएगा। लेकिन इसका हिस्सा जीडीपी में 2009-10 से 2013-14 तक रहे 17.5 प्रतिशत से घटकर बीते वित्त वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में 15.4 प्रतिशत रह गया है। यह खुद सरकार की ताज़ा आर्थिक समीक्षा की स्वीकारोक्ति है।

मेक-इन इंडिया का नारा जब उछाला गया था कि तब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि विश्व में जो स्थिति है, बाज़ार जिस तरह सिकुड़ चुका या भर चुका है, उसमें हमें मेक फॉर इंडिया की बात करनी चाहिए क्योंकि भारत के पास बहुत बड़ा आंतरिक बाज़ार है। आज मोदी जी उसी की नकल करके घरेलू बाज़ार और आत्मनिर्भरता का जुमला उछाल रहे हैं। लेकिन उन्होंने इस आत्मनिर्भरता के लिए अंग्रेज़ी में जो पांच ‘पिलर’ गिनाए हैं – इकनॉमी में क्वांटम जम्प, इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉज़ी ड्रिवेन सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड, वे अपने आप में इतने अमूर्त और हवाई हैं कि उनसे कोई भरोसा नहीं जमता।

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम गिनती करते बताते हैं कि मोदी जी ने 20 लाख करोड़ रुपए का जो आर्थिक पैकेज घोषित किया है, उसमें वास्तविक आर्थिक पैकेज मात्र 1.86 लाख करोड़ रुपए का है जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.91 प्रतिशत बनता है। उनका कहना है, “वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज का असली मूल्य तब पता चलेगा जब 2020-21 के बजट में निर्धारित 30,42,230 करोड़ रुपए के खर्च के ऊपर किए जा रहे अतिरिक्त खर्च की फंडिंग के लिए अतिरिक्त उधार का पता चलेगा।”

मोदी जी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा था, आज विश्व में आत्मनिर्भर शब्द के मायने बदल गए हैं, ग्लोबल वर्ल्ड में आत्मनिर्भरता की डेफिनिशन बदल गई है। अर्थकेंद्रित वैश्वीकरण बनाम मानव केंद्रित वैश्वीकरण की चर्चा जोरों पर है।” मानव केंद्रित वैश्वीकरण की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री अगर यह भी बता देते कि स्वास्थ्य पर जीडीपी का 1.28 प्रतिशत और शिक्षा पर 3 प्रतिशत खर्च करके देश की मानव संपदा को कैसे विश्वस्तर का बनाया जा सकता है तो उनकी नीयत पर सवाल नहीं उठता। लेकिन जब वे ‘डेमोक्रेसी में वायब्रेंट डेमोग्राफी’ जैसे शब्द उछालते हैं तो साफ हो जाता कि उनकी मंशा ठोस काम करने नहीं, बल्कि विशुद्ध लफ्फाज़ी करने की है।

इस लफ्फाज़ी की धुंध हटाकर देखें तो हकीकत यही है कि आज के युग के सारी दुनिया से कटकर कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। भारत अब भी पेट्रोलियम व कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 80 प्रतिशत आयात से पूरी करता है। कुछ सालों तक अमेरिका की भी विदेशी निर्भरता ज्यादा थी। लेकिन उसने शेल गैसों का खनन शुरू करके यह निर्भरता खत्म कर दी। भारत में भी मेघालय में ऐसी शेल गैसों की खदानें विकसित की जा सकती हैं। लेकिन मोदी सरकार अपने प्रिय वेदांता समूह को सरकारी कंपनी ओएनजीसी के तेल ब्लॉक बिकवाने में लगी रही है। उसने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वेदांता समूह को गोवा व कर्नाटक में लौह अयस्क के फिर से खनन की इजाजत दे दी जाए। पर्यावरण को भयंकर नुकसान पहुंचाकर जो सरकार स्टील जैसा तैयार माल नहीं, बल्कि लौह अयस्क जैसा कच्चा माल देश से निर्यात करवा रही हो, वह भारत को कैसे आत्मनिर्भर बना सकती है?

भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाज़ार है। लेकिन देश में आज किलो भर भी सोने का खनन नहीं हो रहा। सारा का सारा सोना विदेश से आयात किया जाता है। दूसरी तरफ हमारे मठों व मंदिरों में हज़ारों टन सोना बेकार पड़ा हुआ है। जब कोरोना संकट में इस सोने के उपयोग की चर्चा उठी तो भाजपा का प्रवक्ता संविद पात्रा चिल्लाने लगा कि यह सोना मंदिर या मठ का नहीं, खुद भगवान का है जिन्हें अदालत ने व्यक्ति मान रखा है तो उस सोने को छूने की हिमाकत कोई कैसे कर सकता है? यह पाखंड इक्कीसवीं सदी के भारत में चल रहा है, यह देखकर अचम्भा होता है। अगर मोदी जी भारत को सचमुच आत्मनिर्भर बनाना चाहते तो देश में सोने का आयात बंद करके मठों व मंदिरों के विशाल स्वर्ण भंडार को बाज़ार में उतारने की घोषणा कर देते। लेकिन वे ऐसा कैसे करते!

यह निर्विवाद सत्य है कि आज वही देश सही मायने में आत्मनिर्भर बन सकता है जो अपने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के लिए अपने प्राकृतिक और मानव संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर रहा हो। अगर भारत अब भी कच्चा माल निर्यात कर रहा है, देश की नौजवान पीढ़ी या तो अशिक्षित है या बेरोजगार तो भारत कतई इन नीतियों के चलते आत्मनिर्भर नहीं बन सकता।

3 Comments

  1. आपके लेखों में साफ तौर पर पूर्वाग्रह नज़र आ रहा है। इसलिए आज से आपके सब्सक्रिप्शन को छोड़ रहा हूं। और कोशिश करूंगा कि मेरे जितने जानने वाले हैं वो भी ऐसा ही करें।

  2. रूपेश मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत टिप्पणी से सहमत मैं आपको निबंध के पहले परिच्छेद की ओर आपका ध्यान बाँटूंगा | सुविधाजनक ढंग से “देशी या विदेशी निजी कंपनियों के हाथों में राष्ट्रीय रणनीतिक व सामरिक महत्व के उद्योग-धंधे और कोयले जैसी भू-संपदा सौंपकर हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने का दावा कतई नहीं कर सकते।” कहते आप कैसे पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की गोद में बैठ स्वयं उनके राजनीतिक जुमले की छड़ी से युगपुरुष मोदी द्वारा स्थापित राष्ट्रीय शासन को पीटे जा रहे हैं ? रघुराज जी, आप कैसे भूल सकते हैं कि १८८५ में फिरंगियों द्वारा रचाए राजनीतिक ढांचे, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुख्य कार्य इंडिया को आत्मनिर्भर बनाना कतई नहीं था | स्वयं अपने में एक राजनीतिक जुमला, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश को आत्मनिर्भर तो दूर इंडिया को भारत ही नहीं बनने दिया क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ के अंतर्गत फिरंगियों के प्रतिनिधि कार्यवाहक केवल अपने विदेशी आकाओं के लिए कार्यरत थे |

    कांग्रेस-मुक्त भारत के पुनर्निर्माण हेतु आपकी भर्त्सना नहीं, आपका सहयोग चाहिए |

  3. Jo Desh kude se bhi upyogi saman bana kar usse dhanoparjan krte hai,hm vo desh hain jinhone korona kaal me apni karodo Manav sampada ko kude se bhi badtar samajh liya.dekha nahi kaise karodon aadmi sdko par marte huye kude ke der me badalte huye.
    Ye koi efficiency ki misani nahi,unke mar jane par samppati hathiyane ki nisaani hai..
    Hamare paaas vahan the,train the,bhojan tha par koi yojna nahi thi maa banayi gai.
    Ek karodon ki Manav sampda sadko par bhatak rahi thi, agar efficient hote to unko aise barbaad nahi hone dete.vo bhi kiraye ke paise ,bhojan ke paise de skte the.ab industry kaise chalegi.?

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