दुनिया के रंगमंच पर भारत की इस समय विचित्र स्थिति है। विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था के बेदम हाल को देखकर किनारा कस रहे हैं। विदेश में कार्यरत भारतीयों को जगह-जगह उलाहना का पात्र बनना पड़ रहा है। जब पता चलता है कि जर्मनी में काम कर रहे भारतीय लोग वही काम कर रहे जर्मनों से 20% ज्यादा कमा रहे हैं, साथ ही भारत में क्रिसमस के मौके पर ईसाइयों पर हमले होते हैं तो यूरोप के कईऔरऔर भी

बीएसई सेंसेक्स इस समय 23.06 और एनएसई निफ्टी सूचकांक 22.36 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। यह दुनिया में केवल अमेरिका के शेयर बाज़ार से सस्ता है, जबकि चीन, जापान, कोरिया, हांगकांग, ब्राज़ील, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा व ऑस्ट्रेलिया तक से महंगा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक शायद इसी वजह से भारत से भागे जा रहे हैं। लेकिन इसके मूल में छिपी एक अन्य वजह है भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत या उपभोग की दयनीय स्थिति। इसके दोऔरऔर भी

किसी भी देश का बनना-बिगड़ना उसके प्राकृतिक व मानव संसंधनों के कुशल नियोजन पर निर्भर करता है। यही राष्ट्र-निर्माण का बुनियादी आधार है। भारत के पास तो पांच हज़ार पुरानी सभ्यता की समृद्ध विरासत भी है। लेकिन जिस तरह मोदी सरकार बारह सालों से देश के प्राकृतिक संसाधनों को अडाणी व अम्बानी जैसे चंद यारों के हवाले करती जा रही है और उसने 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, दस करोड़ किसानों को सरकारी अनुदान, 11 करोड़औरऔर भी

करीब नौ महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान जताया था कि कैलेंडर वर्ष 2025 या वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उस समय सरकार के तमाम मंत्रियों और भाजपा नेताओं के साथ ही नीतिऔरऔर भी

कोई भी जीत या हार अकारण नहीं होती। अमेरिका और चीन आज अगर एआई में इतने आगे निकल गए हैं तो उसकी ठोस वजह है। भारत अगर प्रतिभाओं का विपुल भंडार रखने के बावजूद इतना पीछे छूट गया है तो इसकी व्यक्तिगत नहीं, सरकारी वजह है। अमेरिका में डार्पा (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी) व नेशनल साइंस फाउंडेशन के साथ ही सिलकॉन वैली के वेंचर कैपिटल फंडों ने दशकों से एआई रिसर्च पर अरबों डॉलर झोंके हैं।औरऔर भी