अपना शेयर बाज़ार इस समय दो अतियों में खिंचा हुआ है। स्टॉक्स जो चढ़ चुके हैं और उतरने का नाम नहीं ले रहे। साथ ही स्टॉक्स जो गिरे हैं और उठने का नाम नहीं ले रहे। चढ़े हुए शेयर खरीद भी लें तो हो सकता है कि 10-12 साल में कंपनी के धंधे के बल पर अच्छा-खासा लाभ दे जाएं। लेकिन दो-तीन साल में उनसे कुछ खास नहीं मिलने जा रहा। वहीं, गिरे हुए शेयर हो सकताऔरऔर भी

यूं तो मंदी की लहर आने पर तेज़ी में चढ़े शेयर भी गिरते हैं। मार्च-अप्रैल 2020 में हम ऐसा देख चुके हैं। लेकिन बराबर चढ़ते शेयरों को शॉर्ट करना ट्रेडर के लिए आत्मघाती होता है। शॉर्ट-सेलिंग के लिए स्टॉक्स चुनने का सीधा-सा सूत्र है: रोज़ाना के भावों के चार्ट पर अगर स्टॉक के भाव 25 दिनों के एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज़ (ईएमए) से ऊपर चल रहे हों तो उसमें कभी शॉर्ट-सेलिंग न करें। शॉर्ट-सेलिंग उन्हीं स्टॉक्स में करेंऔरऔर भी

आपको भरोसा था कि शेयर आगे गिरनेवाला है तो उसे शॉर्ट कर दिया। लेकिन अगर भाव घटने के बजाय बढ़ गए तो आपको बढ़े भाव पर शेयर खरीदकर ब्रोकर को लौटाने होते हैं। वैसी स्थिति में शॉर्ट-सेलिंग चूंकि मार्जिन पर आधारित सौदा होता है, इसलिए कई गुना लाभ का लालच आपको कई गुना घाटे में फंसा देता है। शॉर्ट-सेलिंग करने में जितना आनंद आता है, शॉर्ट-कवरिंग की नौबत आने पर उससे कहीं ज्यादा तकलीफ होती है औरऔरऔर भी

शॉर्ट-सेलिंग का सीधा-सा फंडा है कि ब्रोकर के पास मार्जिन मनी रखकर आप उन शेयरों को निश्चित भाव पर बेच देते हो जो आपके पास नहीं होते। ये शेयर असल में ब्रोकर अपने खाते से उसी भाव पर सामनेवाले को दे देता है और आपके ऊपर उधार चढ़ा देता है। आपको भरोसा रहता है कि संबंधित शेयर का भाव आगे गिरेगा। अगर ऐसा हुआ तो आप सस्ते भाव पर खरीदकर वो शेयर ब्रोकर को लौटा देते हो।औरऔर भी

शॉर्ट-सेलिंग केवल उन्हीं सूचकांकों व स्टॉक्स में की जा सकती है जो डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल हैं। ऐसे तीन सूचकांक हैं निफ्टी-50, निफ्टी बैंक और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज़। वहीं, इस सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स की संख्या 160 है। एनएसई की साइट से आपको इनके लॉट साइज़ की जानकारी मिल जाएगी। लेकिन शॉर्ट-सेलिंग में सबसे बड़ी उलझन मार्जिन की है जिसकी पूरी जानकारी आपको आपका ब्रोकर ही दे सकता है। मार्जिन से कई गुना मूल्य के सौदे आपऔरऔर भी