शेयर बाज़ार के ट्रेडर को लागत निकालने या दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रेक-इवेन करने के लिए साल भर में अपने पोर्टफोलियो पर कम से कम 20% रिटर्न हासिल करना चाहिए। इसके ऊपर वह जितना कमाएगा, वही उसका मुनाफा होगा। हकीकत यह है कि बड़े-बड़े सफल म्यूचुअल फंड मैनेजर सालाना 20% रिटर्न नहीं दे पाते। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि आम ट्रेडर के लिए कितनी बड़ी चुनौती है। मगर, हालत यह कि यहां तो नए-नवेलेऔरऔर भी

प्रमुख ब्रोकरेज़ फर्म ज़िरोधा के संस्थापक नितिन कामथ ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि उनके ग्राहक सरकार को सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) और स्टैम्प ड्यूटी के रूप में कुल जितना टैक्स देते हैं, वह देश की 25वीं सबसे बड़ी कंपनी द्वारा दिए जा रहे कॉरपोरेट या इनकम टैक्स से भी ज्यादा है। यह भी खबर है कि इस साल जून तिमाही में सरकार को मिला एसटीटी साल भर पहले की तुलना में दोगुने सेऔरऔर भी

शेयर बाजार के ज्यादातर ट्रेडरों के पास कोई हिसाब नहीं रहता कि उनकी पूंजी का कितना हिस्सा लागत के रूप में चला जाता है। हर स्टॉक के भावों के साथ हर दिन इम्पैक्ट कॉस्ट दी रहती है। लेकिन अक्सर कोई इसे देखता ही नहीं। आप जिस भाव पर बेचना या खरीदना चाहते हैं, उतने पर सौदा कर पाते हैं या नहीं, यह लागत इससे वास्ता रखती है। सिक्यूरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स, स्टैम्प ड्यूटी, जीएसटी और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्सऔरऔर भी

अगर आप नशे, सनसनी या उन्माद के लिए शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग करते हैं तो यह हरकत फौरन बंद कर दें। अन्यथा अपने साथ-साथ आप अपनों को भी ले डूबेंगे। ट्रेडिंग एक बिजनेस है। इनकम टैक्स वाले भी ट्रेडिंग से होनेवाली आय को बिजनेस आय मानकर टैक्स लगाते हैं। इसलिए जो नियमित ट्रेड करते हैं, उन्हें इस हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए। बिजनेस की तरह ही धैर्य, शांति व अनुशासन से ट्रेडिंग करनी चाहिए। व्यापारी कीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सारे के सारे कूदनेवाले आते हैं तो खुद कमाने के लिए। लेकिन हकीकत में दूसरों की कमाई कराके चले जाते हैं। उन्हें होश ही नहीं रहता कि वे जितने ज्यादा सौदे करेंगे, उस पर ब्रोकरों से लेकर स्टॉक एक्सचेंज और सरकार की पक्की कमाई होती रहती है। ज्यादातर ट्रेडर अक्सर कोई गिनती ही नहीं करते कि महीने में कम से कम कितना कमाएं कि सारा टैक्स, ब्रोकरेज़ व अन्य खर्चों के बादऔरऔर भी